हम तो सागर की-कविता-रामेश्वर नाथ मिश्र ‘अनुरोध’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rameshwar Nath Mishra Anurodh 

हम तो सागर की-कविता-रामेश्वर नाथ मिश्र ‘अनुरोध’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rameshwar Nath Mishra Anurodh

 

हम तो सागर की लहर नहीं गिनते यारो!
भवसागर की छाती पर यान चलाते हैं ।
जो बुझ न सके सदियों-शताब्दियों तक ऐसी
हम स्वाभिमान की शाश्वत आग जलाते हैं ।।
जिनको सुनकर संसार मुग्ध हो जाता है
हम ऐसा राग सुनाते, मीड़ लगाते हैं ।
निष्प्राण देह में जो भर देते प्राण नये
हम क्रांति – शौर्य के ऐसे भाव जगाते हैं ।।
सर्वदा नग्न तलवार लिए हम चलते हैं,
मणि – स्वर्ण – रजत – रंजित हम म्यान गलाते हैं ।

सर्वोच्च त्याग करने में हमे मजा मिलता,
हम छलते नहीं, छले जाने से पर, कतराते हैं ।।
हाँ, बार – बार जो हमें चुनौती देता है,
उसका जवाब हम देते उसकी भा षा में ।
हम शस्त्र उठाते विश्व – शांति के लिए सखे !
नूतन विकास की आशा में, अभिलाषा में ।।
जो शौर्य – दीप्त वह ही सहिष्णुता हमको प्रिय,
जो शक्ति – शून्य उसको अभिशाप समझते हैं ।
जो दंडनीय उस पर हम दया नहीं करते,
सत्वर निर्णय लेने में नहीं झिझकते हैं ।।

 

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