हमारे सुरसाज़-ग़ज़लें -मौलाना रूमी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maulana Rumi Poetry

हमारे सुरसाज़-ग़ज़लें -मौलाना रूमी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maulana Rumi Poetry

चाहे तोड़ दो हमारे साज़ अय मुल्ला
साज़ हमारे पास हजारों और भी हैं

इश्क़ के पन्जों में हम गिर गए जो
क्या फ़िक्र जो बाजे-बन्सी कम हुए हैं

सारे जहाँ के साज़ जो जल भी जाएँ
बहुत सुरसाज़ तो भी छिप कर खड़े हैं

तरंग और तान उनकी गई आसमां तक
मगर उन बहरे कानों में कुछ आता नहीं है

दुनिया के चराग़ व शमा सब बुझ भी जाएँ
तो ग़म क्या, चकमक जहां में कम नहीं है

ये नग़मा तो एक तिनका दरिया के ऊपर
गौहर दरिया की सतह पर आता नहीं है

पर हुस्न उस तिनके का जानो गौहर से
उस चौंध की अक्स की अक्स हम पर गिरी है

ये नग़में सारे वस्ल के शौक़ की हैं शाख़ें
और मूल और शाख़ कभी बराबर नहीं हैं

तो बन्द कर ये मुँह और दर खोल दिल का
उस राह से बातें रूहों से फिर किया कर

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