हमदम-यार जुलाहे-गुलज़ार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gulzar

हमदम-यार जुलाहे-गुलज़ार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gulzar

मोड़ पे देखा है वह बूढ़ा सा एक पेड़ कभी?
मेरा वाकिफ है, बहुत सालों से जानता हूँ

जब मैं छोटा था तो इक आम उड़ाने के लिए
परली दीवार से कन्धों पे चढ़ा था उसके
जाने दुखती हुई किस शाख से जा पाँव लगा
धाड़ से फेंक दिया था मुझे नीचे उसने
मैंने खुन्नस में बहुत फेंके थे पत्थर उस पर

मेरी शादी पे मुझे याद है शाखें देकर
मेरी वेदी का हवन गर्म किया था उसने

और जब हामला थी ‘बीबा’ तो दोपहर में हर दिन
मेरी बीवी की तरफ़ कैरियां फेंकी थी इसी ने

वक्त के साथ सभी फूल, सभी पत्ते गए
तब भी जल जाता था जब मुन्ने से कहती ‘बीबा’
‘हाँ, उसी पेड़ से आया है तू, पेड़ का फल है’
अब भी जल जाता हूँ, जब मोड़ गुजरते में कभी
खांसकर कहता है, ‘क्यों, सर के सभी बाल गए?’

सुबह से काट रहे हैं वह कमेटी वाले
मोड़ तक जाने की हिम्मत नहीं होती मुझको

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