हज़ल (हास्य ग़ज़ल)-ग़ज़लें-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra 

हज़ल (हास्य ग़ज़ल)-ग़ज़लें-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra

नींद आती ही नहीं धड़के की बस आवाज़ से
तंग आया हूँ मैं इस पुर-सोज़ दिल के साज़ से

दिल पिसा जाता है उन की चाल के अंदाज़ से
हाथ में दामन लिए आते हैं वो किस नाज़ से

सैकड़ों मुर्दे जलाए हो मसीहा नाज़ से
मौत शर्मिंदा हुई क्या क्या तिरे एजाज़ से

बाग़बाँ कुंज-ए-क़फ़स में मुद्दतों से हूँ असीर
अब खुले पर भी तो मैं वाक़िफ़ नहीं पर्वाज़ से

क़ब्र में सोए हैं महशर का नहीं खटका रसा
बाज़ आए ऐ मसीहा हम तिरे एजाज़ से

वाए ग़फ़लत भी नहीं होती कि दम भर चैन हो
चौंक पड़ता हूँ शिकस्त-ए-होश की आवाज़ से

नाज़ मअशूक़ाना से ख़ाली नहीं है कोई बात
मेरे लाशे को उठाए हैं वो किस अंदाज़ से

कब्र में सोए हैं महशर का नहीं खटका ‘रसा’
चौंकने वाले हैं कब हम सूर की आवाज़ से

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