स्वेदगंगा-2-विंदा करंदीकर -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Vinda Karandikar 

स्वेदगंगा-2-विंदा करंदीकर -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Vinda Karandikar

 

स्वेद की गंगा अविरल गंगा
हाँफती हुई बहती गंगा
अनन्त से है अनन्त की तरफ।

चट्टानों पर सिर पटकती
गिरि-कन्दराओं को तोड़ती-फोड़ती
खाई-खाई पर कूदती-फाँदती।

स्वेद की गंगा अविरल गंगा
देश, धर्म, और रक्त के सारे
तोड़ती बाँध, काटती धारे
भिगोती मिट्टी काली गोरी
दौड़ रही दुनिया को लेकर
जीवन नैया नाचे जिस पर।

स्वेद की गंगा अविरल गंगा
रात-दुपहरी, साँझ-सकारे
जाड़े हों या धूप के पहरे
बहती थी, बहती रहती है
उफनती नागिन जैसी
जो भी कुचले उसको डसती।

स्वेद की गंगा अविरल गंगा
खेतों में चलते हल के पीछे
मिलों और मशीनों के पीछे
खदानों और कटारों में
बेलौस चली है कगारों से
हर नाम मिटाती, निशां मिटाती।

स्वेद की गंगा अविरल गंगा
पहाड़ तोड़ती, खाई भरती
समतल करती सारी धरती,
युगों-युगों से दिशा बदलती
सँजोती परमेच्छा विकास की
और जुल्मी राज को धूल में मिलाती।

स्वेद की गंगा अविरल गंगा
काला पानी, लाल मिट्टी
गीत क्रान्ति के गाती चलती
कई मुखों और कई दिशाओं
तलाशती सागर संघटना का
नवयुग का और स्वतन्त्रता का।

(अनुवाद : रेखा देशपांडे)

 

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