स्वेदगंगा-1-विंदा करंदीकर -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Vinda Karandikar 

स्वेदगंगा-1-विंदा करंदीकर -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Vinda Karandikar

 

भागीरथी के दर्शन
और पापों का परिमार्जन,
गंगातट पर कतिपय सज्जन
शाम सुहानी आते
और करते रहते भाषण।

‘सब नदियों में शुभकर गंगा’
एक ने कहा, बोला दूजा-
‘गंगा से भी स्वर्गंगा सुन्दर’
यूँ ही बोला तीजा इस पर
‘लोप हो गयी तीजी गंगा।’

बेजा बकबक, प्रचार नंगा
ज़हरीले शब्दों का दंगा
लोप कहाँ से? सुनो सज्जनो!
उमड़-घुमड़ती तीजी गंगा।

(अनुवाद : रेखा देशपांडे)

 

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