स्वेदगंगा : पुजारी-विंदा करंदीकर -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Vinda Karandikar 

स्वेदगंगा : पुजारी-विंदा करंदीकर -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Vinda Karandikar

 

गंगा के तट पर ये सारे
स्वार्थ के क्षेत्र रचाने वाले
देवपुजारी जमा हो गये
लाभ-लोभ के मन्त्र-जाप से
ऐयाशी की मूर्ति पूजने।

रहे प्रसन्न सदा ये देवी
अपने ही को केवल वरती
इसी हेतु अभिषेक-अर्थ ये
देवपुजारी स्वेद नदी से
स्वेद बिन्दु की भरते गगरी।

ऐयाशी के बाग़ सींचने
स्वेद बिन्दु ना तन-मन देंगे
यही सोच कर बाँध बनाने
स्वेदबिन्दु से कहे पुजारी
‘या तो आएँ या मर जाएँ।’

स्वेद की यह समाजगंगा
इसी तरह से बहती धारा
बाँध किसलिए बनवाएँ ये?
बाँध नहीं, तो भोंदू जन हे!
स्वार्थ की गगरी भरें तो कैसे?

पल पल बढ़ता जाता है जल
पल पल बढ़ता जाता है, बल
व्यर्थ बनाते बाँध तटों पर
जितने भी बनवाओगे तुम
टूटेंगे, बह जाएंगे सब।

अरे पुजारी , छोड़ो भी भ्रम
घिरे हुए हो पानी में तुम
मन्दिर के संग डूबोगे तुम
तुम्हरी धरती में तुम्हें गाड़ कर
स्वेदनदी आगे बढ़ जाए।

व्यर्थ तुम्हारे बाँध ये सारे
स्वेदनदी उल्टी ना घूमे
तेज़ दौड़ती बढ़ती आगे
रोकेंगे जो, उनके मुर्दे
लिये समेटे, आगे भागे।

पवित्र यह गंगाजल सारा
देवी पर तुम न कभी चढ़ाना
देवी से भी पावनतर
मानव पर तुम इसे चढ़ाना
और पूजना समाज शंकर।

(अनुवाद : रेखा देशपांडे)

 

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