स्वर्णधूलि -सुमित्रानंदन पंत -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sumitranandan Pant Part 8

स्वर्णधूलि -सुमित्रानंदन पंत -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sumitranandan Pant Part 8

प्रतीति

विहगों का मधुर स्वर
हृदय क्यों लेता हर?
क्यों चपल जल लहर
तन में भरती सिहर?
तुमसे!

नीला सूना सा नभ
देता आनंद अलभ
ऊषा संध्या द्वाभा
स्वर्ण प्रभ,
तुमसे!

यह विरोध वारिधि जग
शूल फूल सँग प्रतिपग
लगता प्रिय मधुर सुभग,
तुमसे!

लुटे घर द्वार मान,
छुटे तन मन प्राण,
कहता है बार बार
मानव हृदय पुकार
रह सकूँगा निराधार
तुमसे?

आशाएँ हो न पूर्ण
अभिलाषा अखिल चूर्ण
जीवन बन जाय भार
सूख जाय स्नेह धार
विजय बनेगी हार
तुमसे!

 सार्थकता

वसुधा के सागर से
उठता जो वाष्प भार
बरसता न वसुधा पर
बन उर्वर वृष्टि धार,
सार्थक होता?

तूने जो दिया मुझे
अमर चेतना का दान
तेरी ओर मेरा प्यार
होता न धावमान,
सार्थक होता?

घुमड़ता छायाकाश
गरजता अंधकार
मृत्यु बाहुओं में बँधी
चेतना करती पुकार,
सार्थक होता?

मर्त्य रहे स्वर्ग रहे
सृष्टि का आवागमन
प्राणों में बना रहे
तेरा चिर रहस मिलन
जीवन सार्थक होगा!

वरुण

वरुण मुक्त कर दो मेरे धिक् जीवन बंधन,
पाप निवारक हे प्रकाश से भर मेरा मन!
ऊपर और खुलें ये पाश गुणों के उत्तम
नीचे प्रथम मध्य में हों श्लथ बंधन मध्यम!

अंत प्राण मन सत रज तम का ही रूपांतर
हम चिर अकलुष बनें प्रदिति का आश्रय पाकर!
यह मानव तम सतत सप्त ऋषियों से रंजित
चैत्य प्राण जिसमें सुषुप्ति में से चिर जागृत!

सदा भद्र संकत्या से हम हों परिपोषित
देवों को कर तृप्त रहें निज सरल, हृष्ट चित!
भद्र सुनें ये श्रवण भद्र देखें ये लोचन
स्थिर अंगों से सदा सत्य पथ करें जन ग्रहण!

ऋजु प्रिय देव सखा बन रहें सुरा से वेष्टित
उनकी भद्रा सुमति करे सब की रक्षा नित!
पृथ्वी द्यो औ’ अंतरिक्ष की समिधा निश्चित
श्रम से तप से अमृत ज्योति का पावें हम नित!

सोमपायी

चिर रमणीय बसंत ग्रीष्म वर्षा ऋतु सुखमय
स्निग्ध शरद हेमंत शिशिर रमणीय असंशय!
मधु केंद्रों को घेर बैठते ज्यों नित मधुवर
ज्ञान इंद्रियों पर स्थित सोम पिपासु निरंतर!—

ध्यान मग्न होकर जीवन मधु करते संचय
अर्पित कर कामना इन्द्र तुम में होकर लय!
रथ पर रख ज्यों पैर बैठ जाते वे तन्मय
ऋजु पथ से तुम ले जाते उनको ज्योतिर्मय!

जिसकी महिमा गाते हिमवत् सिन्धु नदी नद
जिसकी बाहु दिशाओं सी फैली हैं कामद,
जहाँ अमृत आनंद ज्योति के झरते निर्झर
मुक्त सोम रस पीकर पाते धाम वे अमर!

ब्रह्म लोक वह, सूर्य समान अमित ज्योतिर्मय
मनोगगन द्यौ विस्तृत सागर सदृश अनामय!
पृथ्वी से अनंत गुण वृद्ध इन्द्र जो ईश्वर
दिव्य शक्तियाँ उसकी अगणित किरणें भास्वर!

मंगल स्तवन

अमित तेज तुम, तेज पूर्ण हो जनगण जीवन
दिव्य वीर्य तुम वीर्य युक्त हों सबके तम मन!
दीप्त औज बल तुम बल ओज करें हम धारण
शुद्ध मन्यु तुम, करें मन्यु से कलुष निवारण!
तुम चिर सह, हम सहन कर सकें धीर शांत बन
पूर्ण बनें हम सोम, सत्य पथ करें सब ग्रहण!
ज्ञान ज्योति का दिव्य चक्षु सामने अब उदित,
देखें हम शत शरद, शरद शत सुनें भद्र नित!
बोलें हम शत शरद, शरद शत तक हों जीवित
ऐश्वर्यों में रहें शरद शत दैन्य से रहित!
शत शरदों से अधिक सुनें देखें हम निश्चित
तन मन आत्मा के वैभव से युक्त अपरिमित!
स्वर्ग शांति दे, अंतरिक्ष दे शांति निरंतर
पृथ्वी शांति, शांति जल, ओषधि शांति दें अमर!
विश्व देव दें शांति, वनस्पति शांति दे सदा
ब्रह्म शांति दें, सर्व शांति दें शांति सर्वदा!
शांति शांति दे हमें, शांति हो व्यापक उष्मक
शांति धाम यह धरा बने, हो चिर मन मादक!

सन्यासी का गीत

छेड़ो हे वह गान अंतत्तोद्भव अकल्प वह गान
विश्व ताप से शून्य गह्वरों में गिरि के अम्लान
निभृत अरण्य देशों में जिसका शुचि जन्म स्थान
जिनकी शांति न कनक काम यश लिप्सा का निःश्वास
भंग कर सका जहाँ प्रवाहित सत् चित् की अविलास
स्त्रोतस्विनी उमड़ता जिसमें बह आनन्द अनास
गाओ बढ़ वह गान वीर सन्यासी गूँजे व्योम
ओम् तत्सत् ओम्!

तोड़ो सब शृंखला, उन्हें निज जीवन बन्धन जान
हों उज्ज्वल कांचन के अथवा क्षुद्र धातु के म्लान
प्रेम घृणा, सद् असद् सभी ये द्वन्द्वों के संधान!
दास सदा ही दास समाप्त किंवा ताड़ित, परतंत्र
स्वर्ण निगड़ होने से क्या वे सुदृढ़ न बंधन यंत्र?
अतः उन्हें सन्यासी तोड़ो छिन्न करो गा मंत्र,
ओम् तत्सत् ओम्!

अंधकार हो दूर ज्योति-छल जल बुझ बारंबार
दृष्टि भ्रमित करता तह पर तह मोह तमस विस्तार!
मिटे अजस्र तृषा जीवन की जो आवागम द्वार
जन्म मृत्यु के बीच खींचती आत्मा को अनजान
विश्वमयी वह आत्ममयी जो मानो इसे प्रमाण
अविचल अतः रहो सन्यासी, गाओ निर्भय गान,
ओम् तत्सत् ओम्!

खोजोगे पालोगे निश्चित कारण कार्य विधान!
कारण शुभ का शुभ औ’ अशुभ अशुभ का फल धीमान्
दुर्निवार यह नियम जीव का नाम रूप परिधान
बंधन हैं सच है पर दोनों नाम रूप के पार
नित्य मुक्त आत्मा करती है बंधन हीन विहार!
तुम वह आत्मा हो सन्यासी, बोलो वीर उदार,
ओम् तत्सत् ओम्!

ज्ञान शून्य वे जिन्हें सूझते स्वप्न सदा निःसार—
माता पिता पुत्र औ’ भार्या, बांधव जन, परिवार!
लिंग मुक्त है आत्मा! किसका पिता पुत्र या दार?
किसका शत्रु मित्र वह जो है एक अभिन्न अनन्य
उसी सर्वगत आत्मा का अस्तित्व नहीं है अन्य!
कहो तत्वमसि सन्यासी गाओ हे तुम हो धन्य,
ओम् तत्सत् ओम्!

एक मात्र है केवल आत्मा ज्ञाता, चिर विमुक्त
नाम हीन वह रूप हीन, वह है रे चिह्न अयुक्त
उसके आश्रित माया, रचती स्वप्नों का भव पाश,
साक्षी वह जो पुरुष प्रकृति में पाता नित्य प्रकाश!
तुम वह हाँ बोलो सन्यासी छिन्न करो तम तोम,
ओम् तत्सत् ओम्!

कहाँ खोजते उसे सखे इस ओर कि या उस पार?
मुक्ति नहीं है यहाँ वृथा सब शास्त्र देव गृहद्वार!
व्यर्थ यत्न सब, तुम्हीं हाथ में पकड़े हो वह पाश
खींच रहा जो साथ तुम्हें! तो उठो बनो न हताश!
छोड़ो कर से दाम, कहो सन्यासी विहँसे रोम,
ओम् तत्सत् ओम्!

कहो शांत हों सर्व शांत हों सचराचर अविराम,
क्षति न उन्हें हो मुझसे मैं ही सब भूतों का ग्राम
ऊँच नीच द्यौ मर्त्य विहारी, सबका आत्माराम!
त्याज्य लोक परलोक मुझे जीवन तृष्णा, भवबंध
स्वर्ग मही पाताल सभी आशा भय, सुखदुख द्वन्द्व!
इस प्रकार काटो बंधन सन्यासी रहो अबंध,
ओम् तत्सत् ओम्!

देह रहे जावे मत सोचो तन की चिन्ता भार
उसका कार्य समाप्त ले चले उसे कर्मगति धार
हार उसे पहनावे कोई करे कि पाद प्रहार
मौन रहो क्या रहा कहो निन्दा या स्तुति अभिषेक?

यत्र तत्र निर्भय विचरो तुम खोलो मायापाश
अंधकार पीड़ित जीवों के! दुखसे बनो न भीत
सुख की भी मत चाह करो जाओ हे रहो अतीत
द्वन्द्वों से सब रटो वीर सन्यासी, मंत्र पुनीत
ओम् तत्सत् ओम्!

इस प्रकार दिन प्रतिदिन जब तक कर्मशक्ति हो क्षीण
बंधन मुक्त करो आत्मा को जन्म मरण हों लीन!
फिर से रह गये मैं तुम ईश्वर जीव या कि भवबंध
मैं सब में सब मुझमें—केवल मात्र परम आनन्द!
कहो तत्वमसि सन्यासी फिर गाओ गीत अमन्द
ओम् तत्सत् ओम्!

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