स्वर्णधूलि -सुमित्रानंदन पंत -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sumitranandan Pant Part 7

स्वर्णधूलि -सुमित्रानंदन पंत -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sumitranandan Pant Part 7

जाति मन

सौ सौ बाँहें लड़ती हैं, तुम नहीं लड़ रहे,
सौ सौ देहें कटती हैं, तुम नहीं कट रहे,
हे चिर मृत, चिर जीवित भू जन!

अंध रूढिएँ अड़ती हैं, तुम नहीं अड़ रहे,
सूखी टहनी छँटती हैं, तुम नहीं छँट रहे,
जीवन्मृत नव जीवित भू जन!

जाने से पहिले ही तुम आगए यहाँ
इस स्वर्ण धरा पर,
मरने से पहिले तुमने नव जन्म ले लिया,
धन्य तुम्हें हे भावी के नारी नर!

काट रहे तुम अंधकार को,
छाँट रहे मृत आदर्शों को
नव्य चेतना में डुबा रहे,
युग मानव के संघर्षों को!

मुक्त कर रहे भूत योनि से
भावी के स्वर्णिम वर्षों को
हाँक रहे तुम जीवन रथ, नव मानव बन,
पथ में बरसा, शत आशाओं को,
शत हर्षों को!

सौ सौ बाँहें सौ सौ देहें नहीं कट रहीं,
बलि के अज, तुम आज कट रहे,
युग युग के वैषम्य, जाति मन,
एवमस्तु बहिरंतर जो तुम
आज छँट रहे!

क्षण जीवी

रक्त के प्यासे, रक्त के प्यासे!
सत्य छीनते ये अबला से
बच्चों को मारते, बला से!
रक्त के प्यासे!

भूत प्रेत ये मनो भूमि के
सदियों से पाले पोसे
अँधियाली लालसा गुहा में
अंध रूढियों के शोषे!

मरने और मारने आए
मिटते नहीं एक दो से
ये विनाश के सृजन दूत हैं
इनको कोई क्या कोसे!
रक्त के प्यासे!

यह जड़त्व है मन की रज का
जो कि मृत्यु से ही जाता
धीरे धीरे धीरे जीवन
इसको कहीं बदल पाता!

ऊर्ध्व मनुज ये नहीं, अधोमुख,
उलटे जिनके जीवन मान,
अंधकार खींचता इन्हें है
गाता रुधिर प्रलय के गान!

रक्त के प्यासे!
हृदय नहीं ये देह लूटते हैं अबला से,
जाति पाँति से रहित दुधमुहे
बच्चों को मारते, बला से!
रक्त के प्यासे!

ऊर्ध्व मनुज बनना महान है
वे प्रकाश की है संतान
ऊर्ध्व मनुज बनना महान है
करना उन्हें आत्म निर्माण!
उन्हें अनादि अनंत सत्य का
करना है आदान प्रदान
धर प्रतीति ज्वाला हाथों में
करना जीवन का सम्मान!
उन्हें प्रेम को सत्य, ज्योति को
शलभ समर्पित करने प्राण,
धुल जावें धरती के धब्बे
इनके प्राणों की बरसा से!
सत्य के प्यासे!

मनुष्यत्व

छोड़ नहीं सकते रे यदि जन
जाति वर्ग औ’ धर्म के लिए रक्त बहाना
बर्बरता को संस्कृति का बाना पहनाना—
तो अच्छा हो छोड़ दें अगर
हम हिन्दू मुस्लिम औ’ ईसाई कहलाना!

मानव होकर रहें धरा पर
जाति वर्ण धर्मों से ऊपर
व्यापक मनुष्यत्व में बँधकर!
नहीं छोड़ सकते रे यदि जन
देश राष्ट्र राज्यों के हित नित युद्ध कराना
हरित जनाकुल धरती पर विनाश बरसाना—
तो अच्छा हो छोड़ दें अगर
हम अमरीकन रूसी औ’ इंग्लिश कहलाना!

देशों से आए धरा निखर,
पृथ्वीहो सब मनुजों की घर
हम उसकी संतान बराबर!
छोड़ नहीं सकते हैं यदि जन
नारी मोह, पुरुष की दासी उसे बनाना,
देह द्वेष औ’ काम क्लेश के दृश्य दिखाना—

तो अच्छा हो छोड़ दें अगर
हम समाज में द्वन्द्व स्त्री पुरुष में बँट जाना!
स्नेह मुक्त सब रहें परस्पर
नारी हो स्वतंत्र जैसे नर
देव द्वार हो मातृ कलेवर!

चौथी भूख

भूखे भजन न होई गुपाला,
यह कबीर के पद की टेक,

देह की है भूख एक!—

कामिनी की चाह, मन्मथ दाह,
तन को हैं तपाते
औ’ लुभाते विषय भोग अनेक
चाहते ऐश्वर्य सुख जन
चाहते स्त्री पुत्र औ’ धन,
चाहते चिर प्रणय का अभिषेक!
देह की है भूख एक!

दूसरी रे भूख मन की!

चाहता मन आत्म गौरव
चाहता मन कीर्ति सौरभ
ज्ञान मंथन नीति दर्शन,
मान पद अधिकार पूजन!
मन कला विज्ञान द्वारा
खोलता नित ग्रंथियाँ जीवन मरण की!
दूसरी यह भूख मन की!

तीसरी रे भूख आत्मा की गहन!

इंद्रियों की देह से ज्यों है परे मन
मनो जग से परे त्यों आत्मा चिरंतन
जहाँ मुक्ति विराजती
औ’ डूब जाता हृदय क्रंदन!

वहाँ सत् का वास रहता,
चहाँ चित का लास रहता,
वहाँ चिर उल्लास रहता
यह बताता योग दर्शन!

किंतु ऊपर हो कि भीतर
मनो गोचर या अगोचर
क्या नहीं कोई कहीं ऐसा अमृत धन
जो धरा पर बरस भरदे भव्य जीवन?
जाति वर्गों से निखर जन
अमर प्रीति प्रतीति में बँध
पुण्य जीवन करें यापन,
औ’ धरा हो ज्योति पावन!

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