स्वर्णधूलि -सुमित्रानंदन पंत -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sumitranandan Pant Part 5

स्वर्णधूलि -सुमित्रानंदन पंत -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sumitranandan Pant Part 5

सामंजस्य

भाव सत्य बोली मुख मटका
‘तुम – मैं की सीमा है बंधन,
मुझे सुहाता बादल सा नभ में
मिल जाना, खो अपनापन!

ये पार्थिव संकीर्ण हृदय हैं,
मोल तोल ही इनका जीवन,
नहीं देखते एक धरा है,
एक गगन है, एक सभी जन!’

बोली वस्तु सत्य मुँह बिचका,
‘मुझे नहीं भाता यह दर्शन,
भिन्न देह हैं जहाँ, भिन्न रुचि,
भिन्न स्वभाव, भिन्न सब के मन!

नहीं एक में भरे सभी गुण
द्वन्द्व जगत में है नारी नर,
स्नेही द्रोही, मूर्ख चतुर हैं,
दीन धनी, कुरूप औ’ सुन्दर!

आत्म सत्य बोली मुसका कर,
‘मुझे ज्ञात दोनों का कारण,
मैं दोनों को नहीं भूलती,
दोनों का करती संचालन!’

पंख खोल सपने उड़ जाते,
सत्य न बढ़ पाता गिन गिन पग,
सामंजस्य न यदि दोनों में
रखती मैं, क्या चल सकता जग?

आज़ाद

पैगंबर के एक शिष्य ने
पूछा, ‘हज़रत बंदे को शक
है आज़ाद कहाँ तक इंसाँ
दुनिया में पाबंद कहाँ तक?’

‘खड़े रहो’ बोले रसूल तब,
‘अच्छा, पैर उठाओ ऊपर,’
‘जैसा हुक्म!’ मुरीद सामने
खड़ा हो गया एक पैर पर!

‘ठीक, दूसरा पैर उठाओ’
बोले हँसकर नबी फिर तुरत,
बार बार गिर, कहा शिष्य ने
‘यह तो नामुमकिन है हज़रत!’

‘हो आजाद यहाँ तक, कहता
तुमसे एक पैर उठ ऊपर,
बँधे हुए दुनिया से कहता
पैर दूसरा अड़ा जमीं पर!’–
पैगंबर का था यह उत्तर!

लोक सत्य

बोला माधव,
‘प्यारे यादव
जब तक होंगे लोग नहीं अपने सत्वों से परिचित
जन संग्रह बल पर भव संकृति हो न सकेगी निर्मित!
आज अल्प हैं जीवित जग में औ’ असत्य उत्पीड़ित
लौह मुष्टि से हमें छीननी होगी सत्ता निश्चित!’

बोला यादव
‘प्यारे माधव
मुझको लगता आज वृत्त में घूम रहा मानव मन,
भौतिकता के आकर्षण से रण जर्जर जग जीवन!
समतल व्यापी दृष्टि मनुज की देख न पाती ऊपर,
देख न पाती भीतर अपने, युग स्थितियों से बाहर!

नहीं दीखता मुझे जनों का भूत भ्रांति में मंगल
वाह्य क्रांति से प्रबल हृदय में क्रांति चल रही प्रतिपल!
मध्य वर्ग की वैभव तंद्रा के स्वप्नों से जग कर
अभिनव लोक सत्य को हमको स्थापित करना भू पर!

युग युग के जीवन से औ’ युग जीवन से उत्सर्जित
सूक्ष्म चेतना में मनुष्य की, सत्य हो रहा विकसित!
आज मनुज को ऊपर उठ औ’ भीतर से हो विस्तृत
नव्य चेतना से जग जीवन को करना है दीपित!’

बोला यादव
‘प्यारे माधव,
वही सत्य कर सकता मानव जीवन का परिचालन
भूतवाद हो जिसका रज तन प्राणिवाद जिसका मन
औ’ अध्यात्मवाद हो जिसका हृदय गभीर चिरंतन
जिसमें मूल सृजन विकास के विश्व प्रगति के गोपन!

आज हमें मानव मन को करना आत्मा के अभिमुख,
मनुष्यत्व में मज्जित करने युग जीवन के सुख दुख!
पिघला देगी लौह मुष्टि को आत्मा की कोमलता
जन बल से रे कहीं बड़ी है मनुष्यत्व की क्षमता!

स्वप्न निर्बल

‘तुम निर्बल हो, सबसे निर्बल!’
बोला माधव!
‘मैं निर्बल हूँ औ’ युग के निर्बल का संबल,’
बोला यादव,
यह युग की चेतना आज जो मुझमें बहती,
बुद्धिमना अति प्राण मना यह सब कुछ सहती!
एक ओर युग का वैभव है एक ओर युग तृष्णा,
एक ओर युग दुःशासन, औ’ एक ओर युग कृष्णा!
देहमना मानव मुरझाता,
आत्म मना मानव दुख पाता
इस युग में प्राणों का जीवन
बहता जाता, बहता जाता!’

क्या है यह प्राणों का जीवन?
कैसा यह युग दर्शन?
बोला माधव
प्रिय यादव
यह भेद बताओ गोपन
‘यह जीवनी शक्ति का सागर
उद्वेलित जो प्रतिक्षण,
जिसको युग चेतना सदा से
करती आई मंथन!’
बोला यादव,
प्रिय माधव
कर शंभु चाप का भंजन
किया राम ने मुक्त
जीर्ण आदर्शों से जग जीवन!
युग चेतना राम बन कर फिर
नवयुग परिवर्तन में
मध्य युगों की नैतिक असि
खंडित करती जन मन में!
यह संकीर्ण नीतिमत्ता है
ज्यों असि धारा का पथ,
आज नहीं चल सकता इसपर
भव मानवता का रथ।
जिसको तुम दुर्बलता कहते
युग प्राणों का कंपन,
मुक्त हो रही विश्व चेतना
तोड़ युगों के बंधन!’
‘प्यारे माधव,’
बोला यादव,
हम दुर्बल हैं यह सच है
पर युग जीवन में दुर्बल
सूक्ष्म शरीरी स्वप्न आजके
होंगे कल के संबल!’

गणपति उत्सव

कितना रूप राग रंग
कुसुमित जीवन उमंग!
अर्ध्य सभ्य भी जग में
मिलती है प्रति पग में!

श्री गणपति का उत्सव,
नारी नर का मधुरव!
श्रद्धा विश्वास का
आशा उल्लास का
दृश्य एक अभिनव!

युवक नव युवती सुघर
नयनों से रहे निखर
हाव भाव सुरुचि चाव
स्वाभिमान अपनाव
संयम संभ्रम के कर!
कुसमय! विप्लव का डर!
आवे यदि जो अवसर
तो कोई हो तत्पर
कह सकेगा वचन प्रीत,
‘मारो मत मृत्यु भीत,
पशु हैं रहते लड़कर!
मानव जीवन पुनीत,
मृत्यु नहीं हार जीत,
रहना सब को भू पर!’
कह सकेगा साहस भर
देह का नहीं यह रण,
मन का यह संघर्षण!
‘आओ, स्थितियों से लड़ें
साथ साथ आगे बढ़ें
भेद मिटेंगे निश्वय
एक्य की होगी जय!
‘जीवन का यह विकास,
आ रहे मनुज पास!
उठता उर से रव है,–
एक हम मानव हैं
भिन्न हम दानव हैं!’

आशंका

यदि जीवन संग्राम
नाम जीवन का,
अमृत और विष ही परिणाम
उदधि मंथन का
सृजन प्रथा तब प्रगति विकास नहीं है
बुद्धि और परिणति ही कथा सही है!
नित्य पूर्ण यह विश्व चिरंतन
पूर्ण चराचर, मानव तन मन,
अंतर्वाह्य पूर्ण चिर पावन!
केवल जीव वृद्धि पाते हैं,
वे परिणत होते जाते हैं,
जीवन क्षण, जीवन के युग,
जीवन की स्थितियाँ
परिवर्तित परिवर्धित होकर
भव इतिहास कहाते हैं!
छाया प्रकाश दोनों मिलकर
जीवन को पूर्ण बनाते हैं!
यदि ऐसा संग्राम
नाम जीवन का,
अमृत और विष ही परिणाम
उदधि मंथन का
तब परिणति ही है इतिहास सृजन का,
क्रम विकास अध्यास मात्र रे मन का!

 जन्म भूमि

जननी जन्मभूमि प्रिय अपनी, जो स्वर्गादपि चिर गरीयसी!
जिसका गौरव भाल हिमाचल
स्वर्ण धरा हँसती चिर श्यामल
ज्योति मथित गंगा यमुना जल,
बह जन जन के हृदय में बसी!

जिसे राम लक्ष्मण औ’ सीता
सजा गए पद धूलि पुनीता,
जहाँ कृष्ण ने गाई गीता
बजा अमर प्राणों में वंशी!

सीता सावित्री सी नारी
उतरीं आभा देही प्यारी,
शिला बनी तापस सुकुमारी
जड़ता बनी चेतना सरसी!

शांति निकेतन जहाँ तपोवन
ध्यानावस्थित हो ऋषि मुनि गण
चिद् नभ में करते थे विचरण,
यहाँ सत्य की किरणें बरसीं!

आज युद्ध पीड़ित जग जीवन
पुनः करेगा मंत्रोच्चारण
वह वसुधैव जहाँ कुटुम्बकम
उस मुख पर प्रीति विलसी!
जननी जन्मभूमि प्रिय अपनी, जो स्वर्गादपि चिर गरीयसी!

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