स्वर्णधूलि -सुमित्रानंदन पंत -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sumitranandan Pant Part 7

स्वर्णधूलि -सुमित्रानंदन पंत -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sumitranandan Pant Part 7

कुंठित

तुम्हें नहीं देता यदि अब सुख
चंद्रमुखी का मधुर चंद्रमुख
रोग जरा औ’ मृत्यु देह में,
जीवन चिन्तन देता यदि दुख
आओ प्रभु के द्वार!

जन समाज का वारिधि विस्तृत
लगता अचिर फेन से मुखरित
हँसी खेल के लिए तरंगें
तुम्हें न यदि करतीं आमंत्रित
आओ प्रभु के द्वार!

मेघों के सँग इन्द्रचाप स्मित
यदि न कल्पना होती धावित,
शरद वसंत नहीं हरते मन
शशिमुख दीपित, स्वर्ण मंजरित
आओ प्रभु के द्वार!

प्राप्त नहीं जो ऐसे साधन
करो पुत्र दारा का पालन,
पौरुष भी जो नहीं कर सको
जन मंगल जनगण परिचालन
आओ प्रभु के द्वार!

संभव है तुम मन से कुंठित
संभव है, तुम जग से लुंठित
तुम्हें लोह से स्वर्ण बना प्रभु
जग के प्रति कर देंगे जीवित,
आओ प्रभु के द्वार!

आर्त

आवें प्रभु के द्वार!
जो जीवन में परितापित हैं,
हतभागे, हताश, शापित हैं,
काम क्रोध मद से त्रासित हैं,
आवें वे आवें वे प्रभु के द्वार!
बहती है जिनके चरणों से पतित पावनी धार!

जो भू के मन के वासी हैं,
स्त्री धन जन यश फल आशी हैं,
ज्ञान भक्ति के अभिलाषी हैं,
आवें वे आवें वे प्रभु के द्वार!
प्रभु करुणा के महिमा के हे मेघ उदार!

पांथ न जो आगे बढ़ सकते,
सुख में थकते, दुख में थकते,
टेढ़े मेढ़े कुंठित लगते,
आवें वे आवें वे प्रभु के द्वार!
पूर्ण समर्पण करदें प्रभु को लेंगे सकल सँवार!

सब अपूर्ण खंडित इस जग में
फूलों से काँटे ही मग में
मृत्यु साँस में, पीड़ा रग में
आवें वे आवें वे प्रभु के द्वार!
केवल प्रभु की करुणा ही है अक्षय पूर्ण उदार?

चेतन

गगन में इंद्रधनुष,
अवनि में इंद्रधनुष!

नयन में दृष्टि किरण
श्रवण में शरद गगन
हृदय के स्तर स्तर में
उदित वह भिन्य वपुष!

अचित् का चिर जहाँ तम,
दुरित जड़ता औ भ्रम
जगत जीवन अमा में
सुवित वह ज्योति पुरुष!

तमस में गिर न रँगा
नींद से पुनः जगा
मरण के आवरण से
प्रकट वह चिर अकलुष!

तृणों में इंद्रधनुष
कणों में इंद्रधनुष
स्पर्श पा चेतन का
जग उठे शप्त नहुष!

मृत्युंजय

ईश्वर को मरने दो, हे मरने दो
वह फिर जी उट्ठेगा, ईश्वर को मरने दो!
वह क्षण क्षण गिरता, जी उठता
ईश्वर को चिर नव स्वरूप धरने दो!

शत रूपों में, शत नामों में, शत देशों में
शत सहस्रबल होकर उसे सृजन करने दो,
क्षण अनुभव के विजय पराजय जन्म मरण
औ’ हानि लाभ की लहरों में उसको तरने दो!
ईश्वर को मरने दो हे फिर फिर मरने दो!

दूर नहीं वह तन से, मन से या जीवन से,
अथवा रे जनगण से!

द्वेष कलह संग्राम बीच वह
अंधकार से औ’ प्रकाश से शक्ति खींच वह
पलता, बढ़ता, विकसित होता अहरह
अपने दिव्य नियम से!

दूर नहीं वह तन से, मन से या जीवन से,
अथवा रे जनगण से!

एक दृष्टि से एक रूप में, देख रहे हम
इस भूमी को जग को औ जग के जीवन को निश्वय,
इसमें सुख दुख जरा मरण हैं जड़ चेतन
संघर्ष शांति—यह रे द्वन्दों का आशय!

परम दृष्टि से परम रूप में यह है ईश्वर,
अजर अमर औ’ एक अनेक सर्वगत अक्षर
व्यक्ति विश्व जड़ स्थूल सूक्ष्मतर!

स प्रत्यगात् शुक्रमकायमव्रणम्
अश्नाविंर शुद्धमपापबिद्धम्
कविर्मनीपी परिभू स्वयंभू—पूर्ण परात्पर!

मरने दो तब ईश्वर को मरने दो हे
वह जी उट्ठेगा ईश्वर को मरने दो!
वह फिर फिर मरता, जी उठता
ईश्वर को चिर मुक्त सृजन करने दो!

अविच्छिन्न

हे करुणाकर, करुणा सागर!

क्यो इतनी दुर्बलताओं का
दीप शून्य गृह मानव अंतर!
दैन्य पराभव आशंका की
छाया से विदीर्ण चिर जर्जर!

चीर हृदय के तम का गह्वर
स्वर्ण स्वप्न जो आते बाहर
गाते वे किस भाँति प्रीति
आशा के गीत प्रतीति से मुखर?

तुम अपनी आभा में छिपकर
दुर्बल मनुज बने क्यों कातर!
यदि अनंत कुछ इस जग में
वह मानव का दारिद्रय भयंकर!

अखिल ज्ञान संकल्प मनोबल
पलक मारते होते ओझल,
केवल रह जाता अथाह नैराश्य,
क्षोभ संघर्ष निरंतर!

देव पूर्ण निज रुपों में स्थित
पशु प्रसन्न जीवन में सीमित,
मानव की सीमा अशांत
छूने असीम के छोर अनश्वर!

एक ज्योति का रूप यह तमस
कूप वारि सागर का अंभस्
यह उस जग का अंधकार
जिसमें शत तारा चंद्र दिवाकर!

 चित्रकरी

जीवन चित्रकरी हे
सृजन आनंद परी हे,

करो कुसुमित वसुधा पर
स्वर्ण की किरण तूलि धर
नव्य जीवन सौन्दर्य अमर
जग की छबि रेखाओं में
रूप रंग भर!

सूक्ष्म दर्शन से प्रेरित
करो जग जीवन चित्रित
मधुर मानवता का मुख
अंतर आभा से कर मंडित!

जीवन चित्रकरी हे,
सृजन सौन्दर्य परी हे,

खो गए भेदों में जन
अहम् में सुप्त अब परम
प्रेम विश्वास शौर्य
स्वर्णिम आशा से भर दो जन मन!

अरुण अनुराग रँगो घन
शांति के शुभ्र हों वसन
हरित रँग शक्ति पीत रँग भक्ति
ज्ञान का नील हो गगन!

जीवन चित्रकरी हे
सृजन ऐश्वर्य परी हे

देह सौन्दर्य गठित हो
प्राण आनंद सरित हों
दृष्टि नव स्वप्न जड़ित हो

स्वर्ण चेतना से जग जीवन
आलोकित हो!

निर्झर

तुम झरो हे निर्झर
प्राणों के स्वर
झरो हे निर्झर!

चिर अगोचर
नील शिखर
मौन शिखर

तुम प्रशस्त मुक्त मुखर,–
झरो धरा पर
भरो धरा पर
नव प्रभात, स्वर्ग स्नात,
सद्य सुघर!

झरो हे निर्झर
प्राणों के स्वर
झरो हे निर्झर!

ज्योति स्तंभ सदृश उतर
जव में नव जीवन भर
उर में सौन्दर्य अमर
स्वर्ण ज्वार से निर्भर
झरो धरा पर
भरो धरा पर
तप पूत नवोद्भूत
चेतना वर!

झरो हे निर्झर!

एकं सत्

इन्द्रदेव तुम स्वभू सत्य सर्वज्ञ दिव्य मन
स्वर्ग ज्योति चित् शक्ति मर्त्य में लाते अनुक्षण!
ऋभुओं से त्रय रचित तुम्हारा ज्योति अश्व रथ
प्राण शक्ति मरुतों से विघ्न रहित विग्रह पथ!

तुम्हीं अग्नि हो, सप्तजिह्व अति विव्य तपस द्युति
पहुँचाती जो अमर लोक तक धी घृत आहुति!
दिव्य वरुण तुम, चिर अकलुष ज्यों विस्तृत सागर
मन की तपः पूत स्थिति, उज्वल, अखिल पाप हर!
तुम्हीं मित्र हो ज्योति प्रीति की शक्ति समन्वित
राग बुद्धि कर्मों में समता करते स्थापित!
गरुत्मान तुम, ज्योतित पंखों के उड़ान भर
आत्मा की आकांक्षा को ले जाते ऊपर!
तुम हो भग, आशा सुखमय, चिर शोक पापहन्!
सूक्ष्म दृष्टि, ईप्सा तप की तुम शक्ति अर्यमन्!
मधुपायी युग अश्विन, तरुण सुभग द्रुत भास्वर,
रोग शमन कर, नव निर्मित तुम करते अंतर!
अमृत सोम तुम झरते दिव आनंद से मुखर
अन्न प्राण जीवन प्रद मुक्त तुम्हारे निर्झर!
काल रूप यम करते निखिल विश्व का विषमन,
तुम्हीं मातरिश्वा, सातों जल करते धारण!
तुम्हीं सूत, आलोक वर्ण ऋत चित के ईश्वर,
पथ ऊषाएँ, दिव्य ओरणाएँ सहस्र कर!
तुम हो, एक स्वरूप तुम्हारे ही सब निश्वित,
विधा उसे तुम बहुधा बहु नामों से कीर्तित!

प्रच्छन मन

वेद ऋचाएँ अक्षर परम व्योम में जीवित
निखिल देवगण चिर अनादि से जिसमें निवसित!
जिसे न अनुभव अक्षर परम तत्व का पावन
मंत्र पाठ से नहीं प्रकाशित होता वह मन!
जिसे ज्ञात वह सत्य वही रे विप्र विपश्चित
ज्योतित उसका बहिरंतर आनंद रूप नित!
एक अंश मानव का मात्र बहिर्मुख जीवन
शेष अंश प्रच्छन्न मनस् में रहते गोपन!
अंतर्जीवन से जो मानव हो संयोजित
पूर्ण बने वह स्वर्ग बने यह वसुधा निश्चित!
अन्न प्राण मन अंतर्मन से हों परिपोषित
सत्य मूल से युक्त ज्योति आनंद हों स्रवित!
तीन अंश वाणी के उर की गुहा में निहित
अधिमानस से दिव्य ज्ञान हो उनका प्रेरित
बहिरंतर मानव जीवन हो सत्य समन्वित,
अंतर्वैभव से भौतिक वैभव हो दीपित!
आत्मा का ऐश्वर्य भूत सौन्दर्य हो महत्
ऊषाओं के पथ से उतरे पूषण का रथ!

सृजन शक्तियाँ

आज देवियों को करता मन भूरि रे नमन
चिन्मयि सृजन शक्तियाँ जो करतीं जगत सृजन!
माहेश्वरी महेश्वर के संदेश को वहन
लक्ष्मी श्री सौन्दर्य विभव को करती वितरण!
सरस्वती विस्तार सूक्ष्म करती संपादन
काली भरती प्रगति, विघ्न कर निखिल निवारण!

आभा देही अखिल देवताओं की माता,
यह अभिन्न अविभाज्य, एकता की चिर ज्ञाता!
इसके सुत आदित्य, सत्य से युक्त निरंतर,
भेद बुद्धि दिति के सुत दैत्य, अहम्मय तमः चर!

आदि सत्य का सक्रिय बोध इला देती नित,
सरस्वती चिर सत्य स्रोत जो हृदय में स्फुरित!
मही भारती वाणी—जिसका ज्ञान अपरिमित,
सद् का देती बोध दक्षिणा, हवि कर वितरित!

शर्मा है प्रेरणा श्वान जो अचित् में अमर,
चित् का छिपा प्रकाश ढूँढ लाता चिर भास्कर!
देवों की शक्तियाँ देवियाँ रे चिर पूजित,
जिनसे मानव का प्रच्छन्न चित्त नित ज्योतित!

इन्द्र

इन्द्र सतत सत्पथ पर देवें मर्त्य हम चरण
दिव्य तुम्हारे ऐश्वर्यों को करें नित ग्रहण!
तुम, उलूक ममता के तम का हटा आवरण
वृक हिंसा औ’ श्वान द्वेष का करो निवारण!
कोक काम रति येन दर्प औ’ गृद्ध लोभ हर
षड रिपुओं से रक्षा करो, देव चिर भास्वर!
ज्यों मृद् पात्र विनष्ट शिला कर देती तत्क्षण
पशु प्रवृत्तियाँ छिन्न करो हे प्रबल वृत्रहन्!
इन्द्र हमें आनंद सदा तुम देते उज्वल
पीछे अघ न पड़े जो आगे हो चिर मंगल!
दिव्य भाव जितने जो देव तुम्हारे सहचर
वृत्र श्वास से भीत छोड़ते तुम्हें निरंतर!
प्राण शक्तियाँ मरुत साथ देते जब निश्वय
पाप असुर सेना पर तुम तब पाते नित जय!
दान दान पर करता हूँ मैं इन्द्र नित स्तवन
तुम अपार हो स्तुति से भरता नहीं कभी मन!
जौ के खेतों में ज्यों गायें करतीं विचरण
देव हमारे उर में सुख से करो तुम रमण!
सर्व दिशाओं से दो हमको, इन्द्र, चिर अभय
विजयी हों षड् रिपुओं पर जीवन हो सुखमय!

Leave a Reply