स्वर्णधूलि -सुमित्रानंदन पंत -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sumitranandan Pant Part 1

स्वर्णधूलि -सुमित्रानंदन पंत -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sumitranandan Pant Part 1

युगागम

आज से युगों का सगुण
विगत सभ्यता का गुण,
जन जन में, मन मन में
हो रहा नव विकसित,
नव्य चेतना सर्जित!

आ रहा भव नूतन
जानता जग का मन
स्वर्ण हास्य मय नूतन
भावी मानव जीवन,
आनता अंतर्मन!

जा रहा पुराचीन
तर्जन कर गर्जन कर
आ रहा चिर नवीन
वर्षण कर, सर्जन कर!

तमस का घन अपार,
सूखी सृष्टि वृष्टि धार,
गरजता,–अहंकार
हृदय भार!

हे अभिनव, भू पर उतर,
रज के तम को छू कर
स्वर्ण हास्य से भर दो,
भू मन को कर भास्वर!

सृजन करो नव जीवन,
नव कर्म, वचन, मन!

काले बादल

सुनता हूँ, मैंने भी देखा,
काले बादल में रहती चाँदी की रेखा!

काले बादल जाति द्वेष के,
काले बादल विश्‍व क्‍लेश के,
काले बादल उठते पथ पर
नव स्‍वतंत्रता के प्रवेश के!
सुनता आया हूँ, है देखा,
काले बादल में हँसती चाँदी की रेखा!

आज दिशा हैं घोर अँधेरी
नभ में गरज रही रण भेरी,
चमक रही चपला क्षण-क्षण पर
झनक रही झिल्‍ली झन-झन कर!
नाच-नाच आँगन में गाते केकी-केका
काले बादल में लहरी चाँदी की रेखा।

काले बादल, काले बादल,
मन भय से हो उठता चंचल!
कौन हृदय में कहता पलपल
मृत्‍यु आ रही साजे दलबल!
आग लग रही, घात चल रहे, विधि का लेखा!
काले बादल में छिपती चाँदी की रेखा!

मुझे मृत्‍यु की भीति नहीं है,
पर अनीति से प्रीति नहीं है,
यह मनुजोचित रीति नहीं है,
जन में प्रीति प्रतीति नहीं है!

देश जातियों का कब होगा,
नव मानवता में रे एका,
काले बादल में कल की,
सोने की रेखा!

अंतर्लोक

यह वह नव लोक
जहाँ भरा रे अशोक
सूक्ष्म चिदालोक!

शोभा के नव पल्लव
झरता नभ से मधुरव
शाश्वत का पा अनुभव
मिटता उर शोक,
स्वर्ग शांति ओक,

रूप रेख जग की लय
बनती वर देवालय,
श्रद्धा में बिकसित भय,
भक्ति मधुर सुख दुख द्वय!

बनता संशय
चिर विश्वास नहीं रोक
क्रांति को विलोक!

यह वह वर लोक
हृदय में उदय अशोक
सूक्ष्म चिदालोक!
स्वर्ण शांति ओक!

स्वर्ग अप्सरी

सरोवर जल में स्वर्ण किरण
रे आज पड़ी वलित चरण!

अतल से हँसी उमड़ कर
लसी लहरों पर चंचल,
तीर सी धँसी किरण वह
ज्योति बसी प्राणों में निस्तल!

उड़ रहे रश्मि पंख कण
जगमगाए जीवन क्षण!

सजल मानस में मेरे
अप्सरी कैसे मरे
स्वर्ग से गई उतर
कब जाने तिर भीतर ही भीतर!

आज शोभा शोभा जल
ज्योति में उठा अखिल जल,
सहज शोभा ही का सुख
लोट रहा लहरों में प्रतिपल!

जागती भावों में छवि
गा रहा प्राणों में कवि
चेतना में कोमल
आलोक पिघल
ज्यों स्वतः गया ढल!

हृदय सरसी के जल कण
सकल रे स्वर्ण के वरण
ज्योति ही ज्योति अजल जल
डूब गए चिर जन्म औ’ मरण!

प्रीति निर्झर

यहाँ तो झरते निर्झर,
स्वर्ण किरणों के निर्झर,
स्वर्ग सुषमा के निर्झर
निस्तल हृदय गुहा में
नीरव प्राणों के स्वर!

ज्ञान की कांति से भरे
भक्ति की शांति से परे,
गहन श्रद्धा प्रतीति के
स्वर्णिम जल में तिरते
सतत सत्य शिव सुंदर!

अश्रु मज्जित जीवन मुख
स्वप्न रंजित से सुख दुख,
रहस आनंद तरंगित
सहज उच्छ्वसित हृदय सरोवर!

गान में भरा निवेदन
प्राण में भरा समर्पण
ध्यान में प्रिय दर्शन
प्रिय ही प्रिय रे गायन
अर्हनिशि भीतर बाहर
यहाँ तो झरते निर्झर
स्वर्ण के सौ सौ निर्झर
स्वर्ग शोभा के निर्झर
उमड़ उमड़ उठता
प्रतीति के सुख से अंतर!

 मातृ शक्ति

दिव्यानने,
दिव्य मने
भव जीवन पूर्ण बने!
दिव्यानने!

आभा सर
लोचन वर
स्नेह सुधा सागर!

स्वर्ग का प्रकाश
हास
करता उर तम विनाश,
किरणें बरसा कर!

भय भंजने,
जन रंजने!

तुम्हीं भक्ति
तुम्हीं शक्ति
ज्ञान ग्रथित सदनुरक्ति!

चिर पावन
सृजन चरण,
अर्पित तन
मन जीवन!

हृदयासने
श्री वसने!

 प्रणाम

श्री अरविन्द सभक्ति प्रणाम!

स्वर्मानस के ज्योतित सरसिज,
दिव्य जगत जीवन के वर द्विज
चिदानंद के स्वर्णिम मनसिज
ज्योति धाम
सज्ञान प्रणाम!

विश्वातमा के नव विकास तुम
परम चेतना के प्रकाश तुम
ज्ञान भक्ति श्री के विलास तुम
पूर्ण प्रकाम
सकर्म प्रणाम!

दिव्य तुम्हारा परम तपोबल
अमृत ज्योति से भर दे भूतल,
सफल मनोरथ सृष्टि हो सकल
श्री ललाम
निष्काम प्रणाम!

 मातृ चेतना

तुम ज्योति प्रीति की रजत मेघ
भरती आभा स्मिति मानस में
चेतना रश्मि तुम बरसातीं
शत तड़ित अर्चि भर नस नस में!

तुम उषा तूलि की ज्वाला से
रँग देती जग के तम भ्रम को,
वह प्रतिभा, स्वर्णांकित करती
संसृति के जो विकास क्रम को!

तुम सृजन शक्ति जो ज्योति चरण धर
रजत बनाती रज कण को,
जड़ में जीवन, जीवन में मन
मन में सँवारती स्वर्मन को!

तुम जननि प्रीति की स्त्रोतस्विनि
तुम दिव्य चेतना दिव्य मना,
तुम स्वर्ण किरण की निर्झरिणी,
आभा देही आभा वसना!

मुख पर हिरण्यमन अवगुंठन
प्राणों का अर्पित तुमको मन
स्वीकृत हो तुम्हें स्पर्शमणि यह,
स्वर्णिम हों मेरे जीवन क्षण!

अंतर्विकास

विभा, विभा
जगत ज्योति तमस द्विभा!
झरता तम का बादल
इंद्रधनुष रँग में ढल
ओझल हँस इंद्रधनुष
केवल फिर चिर उज्वल
विभा!
मनस रूप भाव द्विभा!
इंद्रियाँ स्वरूप जड़ित,
रूप भाव बुद्धि जनित
भाव दुख सुख कल्पित,
ज्ञान भक्ति में विकसित,
विभा!
जीवन भव सृजन द्विभा!
सृजन शील जग विकास,
जड़ जीवन मनोभास,
आत्माहम्, परे मुक्ति,
स्वर्ण चेतना प्रकाश,
विभा!
जन्म मरण मात्र द्विभा!

 

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