स्वर्णद्वीप- कविता -अब्दुर रहमान राही -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Abdur Rehman Rahi

स्वर्णद्वीप- कविता -अब्दुर रहमान राही -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Abdur Rehman Rahi

 

सूरज आज जल्दी डूबा।
सुनहरी आभा चीड़वन की बुझती आग की तरह बुझ गयी।
शाम की परछाइयों के लम्बे, काले बाल फैल गये।
पहाड़ के पीछे से चाँद निकल आया
और तारों की नशीली आँखें चमकने लगीं।
सुहानी हवा ने कुछ विचित्र होते देखा
तो झील के कानों में फुसफुसा कर उसने राज़ की बात कह दी।
वहाँ एक लहर उठी, और यहाँ एक कमल ने आँखें खोलीं।
शालीमार के पीछे का पहाड सपनों में खो गया।
आओ! एक पल के लिए इस द्वीप पर और मेरे साथ देखो।
शहर का शोरोगुल यहाँ आ कर कम हो जाता है।
सुनो! मीठा संगीत धरती से स्वर्ग तक की हवाओं में भर रहा है,
मानो उत्साह से भरे लोग हरसू जलतरंग बजा रहे हों।
मैंने सोचा सुख की एक और नाव तेलबल से आ रही है
पुल के पास डोंगी से अभी भी रौशनी आ रही है।
नसीम बाग़ में कितने सुख के खोजी हैं
चिनार की ठंडी मद्धिम हवा ने ज़रूर उन्हें नींद की
आगोश में सुला दिया होगा!

चिन्ता मुझे पागल कर देती है, ख़्याल की लकीरें माथे पर
ऐसे उभर आती हैं जैसे दहकते अंगारे
सोचो यहाँ कितने आये हैं सुख की खोज में
इस झील की सम्मोहक खूबसूरती से पगलाये
पगलाये, ललचाये और फिर भूल गये!
सोचो, कितनी सुन्दर औरतों ने
अपने चाँदी जैसे बदन इस स्याह जल में धोये होंगे!
कितनी प्यासी आत्माएँ यहाँ जुटी होंगी
और आबद्ध हुई होंगी इसी चाँद की रौशनी के नीचे!
कितने प्रेमियों ने कितनी-कितनी प्रतीक्षा की होगी
अपने पहले प्यार की
उस दूर तट पर।
कितने महाराजाओं को ऐसा सम्मोहन
महसूस हुआ होगा
बेचारे, अपनी तमाम दौलत के बावजूद!
कितनी प्रेमिकाओं की जादुई आँखों ने
कमल के इन हरे पत्तों पर
अनमोल मोती गिराये होंगे!
कितने बहादुर लोगों को
इन पहाड़ों ने प्यार और शाबाशी के भाव से देखा होगा
और महान संकल्पों के ऐश्वर्य का आशीर्वाद दिया होगा

कितनी बेचैन आत्माओं ने अपना दुख उँड़ेला है
तारों भरे इस आकाश के सामने, अपने एकमात्र दोस्त के सामने!
नशे में डूबी शामें स्वर्ण द्वीप की
इसने पहले भी मुझसे अनेक पागल कवियों को सम्मोहित किया है
इतनी मीठी गले वाली बुलबुलें और कहाँ उड़ती हैं ?
सूरज की गर्मी पहाड़ों की बर्फ़ को पिघला देती है
और पतझड़ बसन्त के रंगीन कपड़ों पर राख छिड़क देता है।

आह, जो भी गया हमेशा के लिए चला गया,
और कोई चिड़िया वहाँ से उड़ कर कभी वापस नहीं आयी!
क्या मौत की अटल बाढ़
एक दिन मुझे भी अपने साथ बहा ले जाएगी?
क्या मैं कभी नहीं लौट पाऊँगा?
इस स्वर्णद्वीप पर एक शाम बिताने कभी नहीं आ पाऊँगा?
क्या मौत की गुफ़ा की कोई खिड़की आधी भी खुली नहीं रहती?
क्या मौत की पत्थर-दीवारों में कभी दरार नहीं आएगी?
इस रहस्य से परदा कब उठेगा,
जीवन-मृत्यु का सत्य कब जाना जाएगा?
क्या मृत्यु रेशम के कीट की तरह
कभी अपने जाल में ख़ुद नहीं उलझ जाएगी?
कब जीवन-जय होगा
और इनसान अमरता प्राप्त करेगा?

(अंग्रेज़ी से अनुवाद : प्रभात रंजन)

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