स्वदेश संगीत -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Swadesh Sangeet Part 3

स्वदेश संगीत -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Swadesh Sangeet Part 3

मेरी भाषा

मेरी भाषा में तोते भी राम राम जब कहते हैं,
मेरे रोम रोम में मानो सुधा-स्रोत तब बहते हैं ।
सब कुछ छूट जाय मैं अपनी भाषा कभी न छोड़ूंगा,
वह मेरी माता है उससे नाता कैसे तोड़ूंगा ।।
कहीं अकेला भी हूँगा मैं तो भी सोच न लाऊंगा,
अपनी भाषा में अपनों के गीत वहाँ भी गाऊंगा।।
मुझे एक संगिनी वहाँ भी अनायास मिल जावेगी,
मेरा साथ प्रतिध्वनि देगी कली कली खिल जावेगी ।।
मेरा दुर्लभ देश आज यदि अवनति से आक्रान्त हुआ,
अंधकार में मार्ग भ्रूळकर भटक रहा है भ्रान्त हुआ।
तो भी भय की बात नहीं है भाषा पार लगावेगी,
अपने मधुर स्निग्ध, नाद से उन्नत भाव जगावेगी ।।

जन्माष्टमी

गगन में घुमड़े हैं घन घोर;
क्या अंधेरे अंधेरे के मिष छाया है सब ओर !

काली अर्द्ध यामिनी छाई,
आली भीति-भामिनी आई;
उसे दुरन्त दामिनी लाई,
चौंक उठे हैं चोर ।

वन्दी वे दम्पति बेचारे
बैठे हैं अब भी मन मारे;
अब तो हे संसार-सहारे !
करो कृपा की कोर ।

राजा जो सबका रक्षक है,
बना आज उलटा भक्षक है;
मार चुका शिशु तक तक्षक है
कंस नृशंस कठोर ।

सहसा बन्धन खुल जाते हैं,
वन्दी प्रभू-दर्शन पाते हैं;
मुक्ति मार्ग वे दिखलाते हैं,
करके विश्व विभोर ।

 जगौनी

उठो, हे भारत, हुआ प्रभात ।
तजो यह तन्द्रा; जागो तात!

मिटी है कालनिशा इस वार,
हुआ है नवयुग का संचार ।
उठो; खोलो अब अपना द्वार,
प्रतीक्षा करता है संसार ।
हदय में कुछ तो करो विचार,
पड़े हो कब से पैर पसार!
करो अब और न अपना घात ।
उठो, हे भारत, हुआ प्रभात ॥

जगत को देकर शिक्षा-दान,
बने हो आप स्वयं अज्ञान!
सुनाकर मधुर मुक्ति का गान,
हुए हो सहसा मूक-समान ।
संभालो अब भी अपना मान,
सहारा देंगे श्री भगवान ।
बनेगी फिर भी बिगड़ी बात ।
उठो, हे भारत, हुआ प्रभात ।

होली

जो कुछ होनी थी, सब होली!
धूल उड़ी या रंग उड़ा है,
हाथ रही अब कोरी झोली।
आँखों में सरसों फूली है,
सजी टेसुओं की है टोली।
पीली पड़ी अपत, भारत-भू,
फिर भी नहीं तनिक तू डोली!

चेतावनी

सौ सौ युगों की साधना भारत, न सो जावे कहीं।
तेरी अमृत आराधना आरत न हो जावे कहीं ।।
वह तीव्र तप की धीरता; बल-वीर्व्य की वर वीरता,
धन, जन मयी गम्भीरता, तुमको न रो जावे कहीं ।।
वह दु:ख की दमनीयता, चिरकीर्ति की कमनीयता,
भय सोच की शमनीयता, सहसा न खो जावे कहीं ।।
तेरी प्रसिद्ध पुनीतता; वह शीलपूर्ण विनीतता,
पर बुद्धी की विपरीतता, अब विष न बो जावे कहीं ।।
वह उच्चता आचार की, विश्वस्तता व्यवहार की,
अनुरक्तता उपकार की, तेरी न धो जावे कहीं ।।
तेजस्विता वह तयाग की, उनमुक्तता अनुराग की,
सुख-सम्पदा भव-भाग की, लुट कर न ढो जावे कहीं ।।
फिर सिद्ध हों शत सिद्धियाँ, लोटें पदों पर ऋद्धियाँ,
फिर हों यहां वे वृद्धियाँ, तू जाग जो जावे कहीं ।।

विजयदशमी

जानकी जीवन, विजय दशमी तुम्हारी आज है,
दीख पड़ता देश में कुछ दूसरा ही साज है।
राघवेन्द्र ! हमेँ तुम्हारा आज भी कुछ ज्ञान है,
क्या तुम्हें भी अब कभी आता हमारा ध्यान है ?

वह शुभस्मृति आज भी मन को बनाती है हरा,
देव ! तुम को आज भी भूली नहीं है यह धरा ।
स्वच्छ जल रखती तथा उत्पन्न करती अन्न है,
दीन भी कुछ भेट लेकर दीखती सम्पन्न है ।।

व्योम को भी याद है प्रभुवर तुम्हारी यह प्रभा !
कीर्ति करने बैठती है चन्द्र-तारों की सभा ।
भानु भी नव-दीप्ति से करता प्रताप प्रकाश है,
जगमगा उठता स्वयं जल, थल तथा आकाश है ।।

दुख में ही हा ! तुम्हारा ध्यान आया है हमें,
जान पड़ता किन्तु अब तुमने भुलाया है हमें ।
सदय होकर भी सदा तुमने विभो ! यह क्या किया,
कठिन बनकर निज जनों को इस प्रकार भुला दिया ।।

है हमारी क्या दशा सुध भी न ली तुमने हरे?
और देखा तक नहीं जन जी रहे हैं या मरे।
बन सकी हम से न कुछ भी किन्तु तुम से क्या बनी ?
वचन देकर ही रहे, हो बात के ऐसे धनी !

आप आने को कहा था, किन्तु तुम आये कहां?
प्रश्न है जीवन-मरन का हो चुका प्रकटित यहाँ ।
क्या तुम्हारे आगमन का समय अब भी दूर है?
हाय तब तो देश का दुर्भाग्य ही भरपूर है !

आग लगने पर उचित है क्या प्रतीक्षा वृष्टि की,
यह धरा अधिकारिणी है पूर्ण करुणा दृष्टि की।
नाथ इसकी ओर देखो और तुम रक्खो इसे,
देर करने पर बताओ फिर बचाओगे किसे ?

बस तुम्हारे ही भरोसे आज भी यह जी रही,
पाप पीड़ित ताप से चुपचाप आँसू पी रही ।
ज्ञान, गौरव, मान, धन, गुण, शील सब कुछ खो गया,
अन्त होना शेष है बस और सब कुछ हो गया ।।

यह दशा है इस तुम्हारी कर्मलीला भूमि की,
हाय ! कैसी गति हुई इस धर्म-शीला भूमि की ।
जा घिरी सौभाग्य-सीता दैन्य-सागर-पार है,
राम-रावण-वध बिना सम्भव कहाँ उद्धार है ?

शक्ति दो भगवन् हमें कर्तव्य का पालन करें,
मनुज होकर हम न परवश पशु-समान जियें मरें।
विदित विजय-स्मृति तुम्हारी यह महामंगलमयी,
जटिल जीवन-युद्ध में कर दे हमें सत्वर जयी ।।

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