स्वदेश संगीत -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Swadesh Sangeet Part 2

स्वदेश संगीत -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Swadesh Sangeet Part 2

शीतल छाया

घूम फिरा चिरकाल मनोमृग,
देख मरीचिका रूपिनी माया!

जीवन हाय ! गंवाया वृथा,
पर पानी का एक भी बूंद न पाया।

सोच अरे, अब भी मन में थक,
हार चुका, मरने पर आया।

भागीरथी निकली जिनसे बस,
देंगे वही पद शीतल छाया ।।

कैसे मनुष्य कहो तुम हो यदि,
हो न तुम्हें निज देश की माया ।

जन्म दिया जिसने तुम को फिर,
पाला, बराबर अन्न खिलाया।

नाक की नाक तुम्हारे लिए यहीं,
चन्द्र की चांदी जो चाँदनी लाया।

और जो अन्त में देगा, तुम्हें निज
गोद में शान्ति की शीतल छाया ।।

भारत, मेरे पुरातन भारत,
नूतन भाव से तू मन भाया ।

भूतल छान चुके, तुझ-सा पर
देश कहीं पर दृष्टि न जाया ।

भाव कि भाषा कि भेस सदा
अपना, अपना है, पराया, पराया ।

माता, पिता, सुत जाया जहाँ,
बस है वहीं प्रेम की शीतल छाया ॥

वारिदों से अभिषेक करा,
नव भानुकरों से शरीर पुछाया ।

गन्ध मला मलयानिल से,
जगतीतल में यश सौरभ छाया ॥

शेष फणों पर बैठ गया,
हरयाली ने आसन आप बिछाया ।

भारत तू ने प्रदान की विश्व को
शान्त स्वराज्य की शीतल छाया ।।

मातृभूमि

नीलांबर परिधान हरित तट पर सुन्दर है।
सूर्य-चन्द्र युग मुकुट, मेखला रत्नाकर है॥
नदियाँ प्रेम प्रवाह, फूल तारे मंडन हैं।
बंदीजन खग-वृन्द, शेषफन सिंहासन है॥
करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस वेष की।
हे मातृभूमि! तू सत्य ही, सगुण मूर्ति सर्वेश की॥

मृतक समान अशक्त, विवश आँखों को मीचे,
गिरता दुआ विलोक गर्भ से हमको नीचे;
करके जिसने कृपा हमें अवलम्ब दिया था,
लेकर अपने अतुल अंक में त्राण किया था,
जो जननी का भी सर्वदा थी पालन करती रही ।
तू क्यों न हमारी पूज्य हो? मातृभूमि, माता मही!

जिसकी रज में लोट-लोट कर बड़े हुये हैं।
घुटनों के बल सरक-सरक कर खड़े हुये हैं॥
परमहंस सम बाल्यकाल में सब सुख पाये।
जिसके कारण धूल भरे हीरे कहलाये॥
हम खेले-कूदे हर्षयुत, जिसकी प्यारी गोद में।
हे मातृभूमि! तुझको निरख, मग्न क्यों न हों मोद में?

पालन, पोषण और जन्म का कारण तू ही,
वक्ष-स्थल पर हमें कर रही धारन तू ही;
अभ्रंकष प्रासाद और ये महल हमारे,
बने हुए हैं अहो तुझी से तुझ पर सारे;
हे मातृभूमि, हम जब कभी शरण न तेरी पायेंगे।
बस, तभी प्रलय के पेट में सभी लीन हो जायेंगे ॥

हमें जीवनाधार अन्न तू ही देती है,
बदले में कुछ नहीं किसी से तू लेती है;
श्रेष्ठ एक से एक विविध द्रव्यों के द्वारा,
पोषण करती प्रेम भाव से सदा हमारा;
हे मातृभूमि, उपजे न जो तुझ से कृषि-अंकुर कभी।
तो तड़प तड़प कर जल मरें, जठरानल में हम सभी ।।

पा कर तुझसे सभी सुखों को हमने भोगा।
तेरा प्रत्युपकार कभी क्या हमसे होगा?
तेरी ही यह देह, तुझी से बनी हुई है।
बस तेरे ही सुरस-सार से सनी हुई है॥
फिर अन्त समय तू ही इसे अचल देख अपनायेगी।
हे मातृभूमि! यह अन्त में तुझमें ही मिल जायेगी॥

जिन मित्रों का मिलन मलिनता को है खोता,
जिस प्रेमी का प्रेम हमें मुददायक होता;
जिन स्वजनों को देख हृदय हर्षित हो जाता,
नहीं टूटता कभी जन्म भर जिनसे नाता;
उन सब में तेरा सर्वदा व्याप्त हो रहा तत्व है ।
हे मातृभूमि, तेरे सदृश किसका महा महत्व है?

निर्मल तेरा नीर अमृत के से उत्तम है।
शीतल मंद सुगंध पवन हर लेता श्रम है॥
षट्ऋतुओं का विविध दृश्ययुत अद्भुत क्रम है।
हरियाली का फर्श नहीं मखमल से कम है॥
शुचि-सुधा सींचता रात में, तुझ पर चन्द्रप्रकाश है।
हे मातृभूमि! दिन में तरणि, करता तम का नाश है॥

सुरभित, सुन्दर, सुखद, सुमन तुझ पर खिलते हैं।
भाँति-भाँति के सरस, सुधोपम फल मिलते है॥
औषधियाँ हैं प्राप्त एक से एक निराली।
खानें शोभित कहीं धातु वर रत्नों वाली॥
जो आवश्यक होते हमें, मिलते सभी पदार्थ हैं।
हे मातृभूमि! वसुधा, धरा, तेरे नाम यथार्थ हैं॥

दीख रही है कहीं दूर तक शैलश्रेणी,
कहीं घनावलि बनी हुई है तेरी वेणी;
नदियां पैर पखार रही हैं बनकर चेरी,
पुष्पों से तरू-राजि कर रही पूजा तेरी;
मृदु मलय-वायु मानो तुझे चन्दन चारु चढ़ा रही ।
हे मातृभूमि, किसका न तू सात्विक भाव बढ़ा रही?

क्षमामई, तू दयामई है, क्षेममई है।
सुधामई, वात्सल्यमई, तू प्रेममई है॥
विभवशालिनी, विश्वपालिनी, दुःखहर्त्री है।
भय निवारिणी, शान्तिकारिणी, सुखकर्त्री है॥
हे शरणदायिनी देवि, तू करती सब का त्राण है।
हे मातृभूमि! सन्तान हम, तू जननी, तू प्राण है॥

आते ही उपकार याद हे माता ! तेरा,
हो जाता मन मुग्ध भक्ति-भावों का प्रेरा;
तू पूजा के योग्य, कीर्ति तेरी हम गावें,
मन होता है-तुझे उठा कर शीश-चढ़ावें;
वह शक्ति कहां, हा ! क्या करें, क्यों हम को लज्जा न हो?
हम मातृभूमि, केवल तुझे शीश झुका सकते अहो !

कारण वश जब शोक-दाह से हम दहते हैं,
तब तुझ पर ही लोट-लोट कर दुख सहते हैं ।
पाखण्डी भी धूल चढ़ाकर तन में तेरी,
कहलाते हैं साधु, नहीं लगती है देरी;
इस तेरी ही शुचि धूलि में मातृभूमि वह शक्ति है-
जो क्रूरों के भी चित्त में उपजा सकती भक्ति है!

कोई व्यक्ति विशेष नहीं तेरा अपना है,
जो यह समझे हाय ! देखता वह सपना है;
तुझ को सारे जीव एक से ही प्यारे हैं,
कर्मों के फल मात्र यहाँ न्यारे न्यारे हैं;
हे मातृभूमि!, तेरे निकट सब का सब सम्बन्ध है।
जो भेद मानता वह अहो! लोचनयुत भी अन्ध है ।।

जिस पृथ्वी में मिले हमारे पूर्वज प्यारे।
उससे हे भगवान! कभी हम रहें न न्यारे॥
लोट-लोट कर वहीं हृदय को शान्त करेंगे।
उसमें मिलते समय मृत्यु से नहीं डरेंगे॥
उस मातृभूमि की धूल में, जब पूरे सन जायेंगे।
होकर भव-बन्धन- मुक्त हम, आत्म रूप बन जायेंगे॥

ऊषा

हरे, बहुत दिन तक सहा अन्धकार का भार ।
अब कब होगा देश में ऊषा-मय अवतार ?
ऐसी दया करो हे देव, भारत में फिर ऊषा आवे ।।

अब यह मिटे अविद्या-रात,
रुज-रजनीचर करें न घात,
दरसे चारों ओर प्रभात,
तम का पता न रहने पावे ।
ऐसी दया करो हे देव, भारत में फिर ऊषा आवे ।।

फैले अहा ! अरुण अनुराग,
चमके फिर प्राची का भाग,
जागें सब आलस को त्याग,
जड़ता की निद्रा मिट जावे ।
ऐसी दया करो हे देव, भारत में फिर ऊषा आवे ।।

गावें द्विज-नेता वह गान-
जिससे हो जावे उत्थान,
गूँजे आत्मतत्व की तान,
सत्यालोक सुमार्ग दिखावे ।
ऐसी दया करो हे देव, भारत में फिर ऊषा आवे ।।

पाकर हम सब पावन योग,
कर के नित्य नये उद्योग,
भोगें मन मानें सुख-भोग,
मानस-मधुप-मुक्त हो गावे ।
ऐसी दया करो हे देव, भारत में फिर ऊषा आवे ।।

 भारतवर्ष

मस्तक ऊँचा हुआ मही का, धन्य हिमालय का उत्कर्ष ।
हरि का क्रीड़ा-क्षेत्र हमारा, भूमि-भाग्य-सा भारतवर्ष ।।

हरा-भरा यह देश बना कर विधि ने रवि का मुकुट दिया,
पाकर प्रथम प्रकाश जगत ने इसका ही अनुसरण किया ।
प्रभु ने स्वयं ‘पुण्य-भू’ कह कर यहाँ पूर्ण अवतार लिया,
देवों ने रज सिर पर रक्खी, दैत्यों का हिल गया हिया!
लेखा श्रेष्ट इसे शिष्टों ने, दुष्टों ने देखा दुर्द्धर्ष !
हरि का क्रीड़ा-क्षेत्र हमारा, भूमि-भाग्य-सा भारतवर्ष ।।

अंकित-सी आदर्श मूर्ति है सरयू के तट में अब भी,
गूँज रही है मोहन मुरली ब्रज-वंशीवट में अब भी।
लिखा बुद्धृ-निर्वाण-मन्त्र जयपाणि-केतुपट में अब भी,
महावीर की दया प्रकट है माता के घट में अब भी।
मिली स्वर्ण लंका मिट्टी में, यदि हमको आ गया अमर्ष ।
हरि का क्रीड़ा-क्षेत्र हमारा, भूमि-भाग्य-सा भारतवर्ष ।।

आर्य, अमृत सन्तान, सत्य का रखते हैं हम पक्ष यहाँ,
दोनों लोक बनाने वाले कहलाते है, दक्ष यहाँ ।
शान्ति पूर्ण शुचि तपोवनों में हुए तत्व प्रत्यक्ष यहाँ,
लक्ष बन्धनों में भी अपना रहा मुक्ति ही लक्ष यहाँ।
जीवन और मरण का जग ने देखा यहीं सफल संघर्ष ।
हरि का क्रीड़ा-क्षेत्र हमारा, भूमि-भाग्य-सा भारतवर्ष ।।

मलय पवन सेवन करके हम नन्दनवन बिसराते हैं,
हव्य भोग के लिए यहाँ पर अमर लोग भी आते हैं!
मरते समय हमें गंगाजल देना, याद दिलाते हैं,
वहाँ मिले न मिले फिर ऐसा अमृत जहाँ हम जाते हैं!
कर्म हेतु इस धर्म भूमि पर लें फिर फिर हम जन्म सहर्ष
हरि का क्रीड़ा-क्षेत्र हमारा, भूमि-भाग्य-सा भारतवर्ष ।।

 शिक्षण

भय-रहित भव-सिन्धु तरना सीख ले कोई यहाँ ।
विश्व में आकर विचरना सीख ले कोई यहाँ ।।

ज्ञान पूर्वक, भक्ति पूर्वक कठिन कर्म-क्षेत्र में,
चाहिए कैसे उतरना ? सीख ले कोई यहाँ।

मुक्ति तो है साथ ही हम सर्वदा स्वच्छन्द हैं,
वासना बंधन-कतरना सीख ले कोई यहाँ ।।

कर्म हैं जितने सभी प्रभु नाम पर होते रहें,
एक मन से ध्यान धरना सीख ले कोई यहाँ ।।

आपदा में, सम्पदा में, हर्ष में या शोक में,
चित्त को चंचल न करना सीख ले कोई यहाँ ।

जानते हैं हम कि है आचार की सीमा कहाँ,
पुण्य के भाण्डार भरना सीख ले कोई यहाँ ।।

त्याग में सर्वस्व क्या, उत्सर्ग करना आप को,
स्वार्थ से सर्वत्र डरना सीख ले कोई यहाँ ।

ॠषि जनों की रीति थी-अपने लिए जीते न थे,
प्रेम में निर्मोह मरना सीख ले कोई यहाँ ।।

बैठे हैं

मत पूछो, कैसे बैठे हो? खाली यहां खड़े बैठे हैं;
कोरी कुल की ऐंठ दिखाकर, घर में बने बड़े बैठे हैं ।
बंधु-बांधवों से टुकड़ों पर श्वान समान लड़े बैठे हैं;
घर घर भीख माँगने को हम पत्थर हुए अड़े बैठे हैं ।
पके बेर के पेड़ों जैसे बारम्बार झड़े बैठे हैं;
बनकर बिगड़ चुके हैं फिर भी सोते सदा पड़े बैठे हैं ।
परवश विषयों के जालों में जड़ बन कर जकड़े बैठे हैं
अपने भूत पूर्व गौरव पर फिर भी हम अकड़े बैठे हैं ।
बने कूप मंडूक, निरुद्यम चौड़े में सकड़े बैठे हैं !
दो हाथों से एक दैव का पिण्ड मात्र पकड़े बैठे हैं !!

चेतना

अरे भारत ! उठ, आंखें खोल,
उड़कर यंत्रों से, खगोल में घूम रहा भूगोल !

अवसर तेरे लिए खड़ा है,
फिर भी तू चुपचाप पड़ा है ।
तेरा कर्मक्षेत्र बड़ा है,
पल पल है अनमोल ।
अरे भारत ! उठ, आंखें खोल ॥

बहुत हुआ अब क्या होना है,
रहा सहा भी क्या खोना है?
तेरी मिट्टी में सोना है,
तू अपने को तोल ।
अरे भारत ! उठ, आंखें खोल ॥

दिखला कर भी अपनी माया,
अब तक जो न जगत ने पाया;
देकर वही भाव मन भाया,
जीवन की जय बोल ।
अरे भारत ! उठ, आंखें खोल ॥

तेरी ऐसी वसुन्धरा है-
जिस पर स्वयं स्वर्ग उतरा है ।
अब भी भावुक भाव भरा है,
उठे कर्म-कल्लोल ।
अरे भारत ! उठ, आंखें खोल ॥

 प्रश्न

सिर क्या सगर्व फिर हम ऊँचा न कर सकेंगे?
जो घाव हो गये हैं क्या अब न भर सकेंगे?
इस भूमि पर कि जिस पर सुर भी कृतार्थ होते,
बनकर मनुज न फिर क्या अब हम विचर सकेंगे ?
वह त्याग जो प्रतिष्ठित था उच्च आत्म पद पर
खोकर उसे अहो! क्या अब हम न धर सकेंगे?
वह वीरता कि थी जो गम्भीर धीरता में
वर के समान हम क्या अब फिर न वर सकेंगे ?
उपकार जो कि पर को अपना बना चुका था
करके स्वदेश का क्या दुख हम न हर सकेंगे ?
उस मार्ग से कि जिससे पूर्वज गये हमारे
जाकर न मृत्यु से क्या अब हम न डर सकेंगे?
भाण्डार शील के जो रहते सदा भरे थे
भरकर भवाब्धि को क्या अब हम न तर सकेंगे ?
पूछें किसे दयामय, तू ही हमें बता दे
फिर आपको अमर कर क्या हम न मर सकेंगे ?

प्रतिज्ञा

न अपनी हीनता को अब सहेंगे हम ।
हदय की बात ही मुंह से कहेंगे हम ।।

प्रकट होगी न क्यों आत्माभिलाषा है,
हमारी मातृभाषा राष्ट्र भाषा है ।
समय के साथ उन्नति की शुभाषा है,
बने भागीरथी जो कर्मनाशा है ।
बहक कर अब न विषयों में बहेंगे हम ।
हदय की बात ही मुंह से कहेंगे हम ।।

हमी उस भाव-सागर को हिलोड़ेंगे,
करोडों रत्न पाकर भी बिलोड़ेंगे ।
हलाहल देखकर भी मुँह न मोड़ेंगे,
पुरुष होकर कभी पौरुष न छोड़ेंगे ।
अमृत पीकर अमर होकर रहेंगे हम ।
हदय की जात ही मुँह से कहेंगे हम ।।

अपनी भाषा

करो अपनी भाषा पर प्यार ।
जिसके बिना मूक रहते तुम, रुकते सब व्यवहार ।।

जिसमें पुत्र पिता कहता है, पतनी प्राणाधार,
और प्रकट करते हो जिसमें तुम निज निखिल विचार ।
बढ़ायो बस उसका विस्तार ।
करो अपनी भाषा पर प्यार ।।

भाषा विना व्यर्थ ही जाता ईश्वरीय भी ज्ञान,
सब दानों से बहुत बड़ा है ईश्वर का यह दान ।
असंख्यक हैं इसके उपकार ।
करो अपनी भाषा पर प्यार ।।

यही पूर्वजों का देती है तुमको ज्ञान-प्रसाद,
और तुमहारा भी भविष्य को देगी शुभ संवाद ।
बनाओ इसे गले का हार ।
करो अपनी भाषा पर प्यार ।।

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