स्मृति सत्ता भविष्यत-स्मृति सत्ता भविष्यत् -विष्णु दे -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Vishnu Dey 

स्मृति सत्ता भविष्यत-स्मृति सत्ता भविष्यत् -विष्णु दे -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Vishnu Dey

 

तुम लोग नये हो, यह उदास विषाद
क्या तुम्हारा भी परिचित है ?
आदि महीदास स्मृति से टकराते हैं,
भूमिदासों की स्मृति की यन्त्रणा
हमारे चैतन्य पर छाया आकाश है।

तुम लोग नये हो, कालान्तर में
आते-जाते क्या चेतना बाँध लेती है ?
बीस-बाईस वर्षों के इतिहास ने
क्या काल की गिनती की है ?
तुम्हारे नये सुख में बाधा दी है ?

तुम लोग नये हो, शायद इसी लिए
प्रवास से जान-पहचान नहीं हुई ?
अपने घर से नितान्त अनजान तुम
आजन्म प्रवासी हो, इसी लिए स्वदेश की
नाना स्मृतियाँ ही तुम्हारा विलास हैं ?

दुनिया की हाटों में खरीदा हुआ
अर्द्ध-परिचित प्रबल उच्छ्वास,
अनात्मीय नव्य प्रतिभास-
फिर भी जान लो, हमीं तुम्हारे परिचित हैं।

वह देखो, अचानक सोलह मंजिली इमारत खड़ी हो गयी है,
शायद पन्द्रह मंज़िलें हों या क्या पता सत्रह,
धरती आसमान का तमाशा,
मानो जिराफ़ ने या किसी महाकाय सरीसप ने गर्दन उठा ली हो,
और चारों ओर जल हाथी, घड़ियाल, साँप, लकड़बग्घे, गीदड़
दफ़्तर गद्दी गुमाश्ते बढ़िया फ़र्श बिछा कर जमे हैं,
बेढंगे, बेतरतीब, बदसूरत,
कलकत्ते के माथे पर कलंक ।

इधर नकली गॉथिक उधर कोरिन्थियाई, आयोनाई, डोरियाई इमारतें
के’लसन का विलायती खब्त ।
पर कुछ भी हो, काल की उर्वर मिट्टी में अहमक साहबी शौक़ के सहारे
अभ्यास का थोड़ा सा प्रसाद ज़रूर पड़ा था,
बंगाले का हाई कोर्ट, गँवारों का अजायबघर
यहाँ तक कि लाटसाब का महल भी आँखों की आदत बन गया था,
और चोरी के साम्राज्य की देशज सड़कों पर
अलियों-गलियों में घिचपिच गन्दी बस्तियों की रौनक़ में
चाहे मनोहर कुछ न हो पर आँखें टिक गयी थीं
निकम्मे घर के लाडले उल्लुओं की, बूढ़े-बूढ़े शालिकों के झुण्डों की,
पक्षी बाबुओं के कानून-कायदों के ढंग पर, खुशहाली और तंगी में ।
कलकत्ते की संकरी नीची धरती ने फिर भी शचीश को विनय को थोड़ा-सा
रस दिया था, थोड़ी-सी धूप दी थी। फिर भी गोरा ने और अन्यान्य
स्वदेशी लड़कों ने
कलकत्ते को पहचाना था, स्वस्थ और सम्पूर्ण स्वाधीन होना चाहा था ।

आज तो बस एक तरफ़ है अधमरों का विकार
और दूसरी तरफ़ है स्वांग भरा प्रलाप, निर्बोध निष्ठुर अमानुषिक अभद्र ।
कौन किसे धिक्कारे अठारहों मंजिलों पर?
जब देश भर में चारों ओर निहायत फ़िजूल का
उन्माद और विलास से भरा खेल चल रहा हो !
धूप की चोट करो, बाढ़ भेजो, हे सूर्य, हे चैतन्य आकाश
यह रोज़-रोज़ का अपघात दूर करो,
इस से तो अच्छा है, इस दग्ध दिन में सालानपुर के युगान्त का श्मशान
भेज दो !

जी खोल कर उस से घृणा करें इस का कोई उपाय नहीं दीखता,
प्राणों के मोहल्ले में उस की कोई जगह नहीं है,
जब वह चोरगलियों में घूमता है तभी शायद वह दिखाई पड़ता है,
घर या सभा का वह मुखिया नहीं है।
शहरी जंगल में जब वे हैवानी आँखें दिखती हैं
तब यह ठीक है मैं डर से चौंक उठता हूँ
पर इसी कारण मैं उस से घृणा करूँ मुझ में इतना दम नहीं,
वन्य पराजय में हार कहाँ है ?
जानवर तो आखिर जानवर ठहरा, उस में कितना ही जोर क्यों न हो,
मन की दुनिया में उस की जगह कहाँ है ?
उस के नाखूनों में मौत ज़रूर है, अर्थहीनता में असह्य
और आकस्मिक, इसी लिए तो हम जय चाहते हैं ।
इसी लिए तो मन में जय की तस्वीर है, इसी लिए तो जय का गीत
गूंजता है,
हम आकस्मिक का पाप मिटा देना चाहते हैं।
पर क्या इसी लिए हम उस से घृणा करें, बराबरी के बिना ही ?
पैरों के पास साँप घूमता हो सकता है,
आसपास चौखट पर या कमरे के कोने में भी हो सकता है विच्छ हों या जोंक,
प्राणों के लोक में चाहे उन की जगह न हो,
यह भी ठीक है कि साँप को मारने पर घृणा से शरीर हहर उठता है,
जूते का भरपूर दबाव भी डाला जा सकता है,
पर क्या इसी लिए बिच्छू को बैठने के लिए घृणा का आसन दें,
जोंक को आखिरकार सभा-भवन में बुला लें ?
घृणा के पत्ते तो हवा में झर जाते है, पर घृणा की मिट्टी है प्रखर प्यार
वही तो मूल है जिस से हम जीवन रोपते हैं, इसी लिए-
जो आदमी तो दूर, शेर भी नहीं, हम उसे क्यों माने जिस के रीढ़ की
हड्डी भी नहीं,
उसे हम घृणा का भी अभिशाप नहीं देंगे।

इस नरक में
लगता है, आशा नहीं है, जीवन की भाषा नहीं है
हम आज जहाँ पर हैं वह कोई गाँव भी नहीं है, शहर भी तो नहीं,
न प्रान्तर है न पहाड़, न नदी, केवल दुःस्वप्न है,
वहाँ न मजूर हैं, न किसान,
हम आज जहाँ है वहाँ लगता है आशा नहीं है,
जीने की आशा नहीं है, जिलाने की भाषा नहीं है,
वहाँ लगातार महामारी है।
वहाँ निर्जल अकाल में रोने की लगातार आवाज
अब मर्म में नहीं पैठती, वहाँ क्रन्दन भी मृत है
क्योंकि किसी को भी कोई आशा नहीं है
या फिर वह इतनी कम है कि कोई निराशा भी नहीं है।
चैतन्य की महामारी।

यहाँ साँझ-सबेरे अभाव मृत्यु अनाहार अपघात लगे रहते हैं
महीने पर महीने महामारी का चक्कर,
यहाँ न जंगल है, न हिंस्र पशु, न आदिम मनुष्य,
न वानप्रस्थवासी उदासी संन्यासी,
यहाँ सभ्यता नहीं है, हृदय सूखा पोखर है,
बुद्धि सड़ी नाली है, आँख-कान के बोध सब मानो चोरी के माल से भी
बासी हैं,
यहाँ शायद कोई सर्वग्रासी नरक भी नहीं है।
कोई अगर हिन्दी का बौराया कुत्ता है तो कोई अँगरेजी का घड़ियाल,
तरह-तरह के फ़ालतू, तरह-तरह के शिकारी शिकार
फिर भी सब के सब गौण अचेतन या अर्धचेतन
नरक के भी कार्टून, मृत्यु के भी विकार ।

नरक का दाह दो नरक की आत्मग्लानि दो हे यमरूपी जीवन
आँसू दो बस्ती के घर-घर में, अवसाद भरी हड्डी-हड्डी में
मर्म में यन्त्रणा की वाणी दो, फल में फल में शाखों में पत्तों में गीली
जड़ दो,
अभ्यस्त तिक्त क्षुब्ध के रूपान्तर में प्राण भरो,
क्षिप्र प्रतिवाद में स्पष्ट वचन के चैतन्य की तीखी धार को
वैशाख की तपती धूप और झपटते अन्धड़ के शोर में
जीवन-मृत्यु की गोधूलि की निर्मलता प्राप्त हो ।

राजा की बेटी आज दफ्तर में जुटी है
राजा का बेटा काम की तलाश में है,
वे खूब जानते हैं कि आज के राजपाट में
वे कुछ भी नहीं हैं।
फिर भी वयस की उषा के संकट में
लड़का सीढ़ियों पर बैठा सोचता है,
लड़की तो सचमुच राजा की बेटी है
पर वह तो राजा का बेटा नहीं है।
पार्क की बेंच पर या फुटपाथ पर
दोनों अक्सर बातें करते हैं,
बहुतों के भाग्य आज खुले हैं
बस उन्हीं के लिए उलटा है।
इसी लिए तो बीच-बीच में राजा का बेटा
जुलूस निकाल कर शोर मचाता है।
राजा की बेटी इसी लिए तो जी खोल कर
हड़ताल का गौरव ग्रहण करती है।
वे प्यार करते हैं, इसी लिए तो घृणा से
तन-मन में आग लग जाती है।
उन के अभाव की अग्निवीणा में
यौवन को जीवन मिला है।

थकान में क्या डर है ?
दिन ढलने पर हम थक जायेंगे
कारखाने में ड्रिल, रन्दा या तकुए पर काम खत्म कर के
पतले, मोटे हाथों का सन्तोष
परिपूर्ण दिन की थकान ।
ध्यान और वास्तव के बीच नाव चलाते इस पार-उस पार
किसी दल में सम्मिलित हो कर
दिगन्त तक फैले खेत में ट्रैक्टर के दीर्घ अभिसार से
मिट्टी की जो थकान आसन्न फ़सल में फलती है
हम वैसी ही थकान चाहते हैं, श्रीमान् !
फिर उस के बाद सूर्य के सँगाती के रूप में सूरज की तरह घर को वापसी।
बांध वाली सड़क के बायें से, अस्पताल के दायें रास्ते के पार,
हर महीने भाँति-भांति के झरे फूलों झरे पत्तों को रौंदते हुए
दिन ढले पहाड़ के आमने-सामने से
चिड़ियों के संगीत से परितृप्त थकान में भर कर अपनी-अपनी गहस्थी की ओर,
कोई गाने में कोई और आमोद-प्रमोद में,
बिजली की बत्ती की पढ़ाई में या सिर्फ़ स्निग्ध अवकाश में रम जाने के लिए।
या शायद बरामदे में बैठ कर या लेट कर, खाट पर, तख्तपोश पर
दिशा-जाल से आकाश के सीने पर चाँद का विकास देखते रहना,
किस तरह हर पखवारे प्रकृति के कौतुक से हँसिये सा चाँद अमावस्या या
पूर्णिमा में ढलता है।
थकान में क्या डर है ? श्रीमान् यह वह थकान थोड़े ही है,
आवारा समाज के बेकुसूर ग्रामशहरों की थकान बड़ी थकन भरी होती है;
ज्ञान और वास्तव में एक-से विन्यस्त जीवन के कर्म में थकान नहीं होती, भैया
हम सभी वैसा थकान भरा अवकाश चाहते है ।

सभी जानते है रवीन्द्रनाथ की वह कहानी :
सारी तैयारियां हो चुकी है, आँगन में मेहराबदार मण्डप तन गया है,
भट्टी चेत रही है, ड्योढ़ी पर की शहनाई
शुद्ध स्वरों से हवा में तैरती सर्वत्र व्याप्त है,
भण्डार में पकवान चिने हैं, तरह-तरह के सरंजाम से
भीतर का कोठा भर गया है, दहेज़ का अम्बार लगा है,
पड़ोसिन सहेलियाँ उत्कण्ठा से शोर कर रही हैं,
बच्चे मस्त खेल रहे हैं, निस्सन्देह कन्या की छाती भी
आग्रह और आवेग से धक-धक कर रही है, शादी के लिए सभी कुछ तैयार है।
यहाँ तक कि बारातो भी आ पहुँचे हैं, भीड़ लग गयी है,
शंख बजने ही वाला है, सुहागिनों के पान रचे ओठों से
गीत-लहरी उठने ही वाली है,
सिर्फ़ वर नहीं है-
यह रवीन्द्रनाथ की कहानी है, कवि ने गज़ब के रूपक से
हम सभी के जीवन की तस्वीर आँक दी है,
मर्मभेदी और बड़ी अद्भुत-
शादी की सब तैयारियां हो चुकी हैं,
यहाँ तक कि बाराती भी आ पहुँचे हैं, सिर्फ़ वर नहीं है-
या शायद वे बाराती न हों, सब के सब बाराती न हों,
उस भीड़ में चोर हैं, जुआचोर है, नामी-गिरामी या नगण्य,
तरह-तरह के भिखारी भी हैं, कोई बाबू तो कोई साहब,
आत्मा के द्वार पर, मन की सड़क पर
समाज के घुरे की सफ़ाई-लौरी पर चढ़े सत्ता के भिखारी,
बीमार, फिर भी गन्दी बस्तियों के वासी नहीं, आढ़त में दफ़्तर में गद्दियों
पर डटे,
तन-मन-प्राण से बीमार, पर शायद धन या क्षमता से नहीं-
तरह-तरह के बाराती हैं, सिर्फ़ वर नहीं है।

वर सत्ता खोजता फिर रहा है, अपना आत्म-परिचय
खेतों में, गंजों में, बन्दरगाहों में वह अपनी सत्ता खोजता है, अपनी शनाख्त
पांच जनों के दर्शन में, समाज के आतशी प्रतिबिम्ब में,
उसे अपनी सत्ता नहीं मिलती, जो बस फूल की तरह
धूप-वर्षा-छाया में मिट्टी से
जड़ों शाखों पत्तों के प्राकृतिक आर्केस्ट्रा में फूट उठती है,
उस फल की तरह जिस की सत्ता मिट्टी में धप-वर्षा में जडों-शाखों में निहित है,
यहां तक कि फूलदान में सजे होने पर भी।
तभी तो आज हमारी सत्ता नहीं है, घर में या सभा में, बैठक में या चायखाने में,
फूलदान की बौद्धिकता में भी नहीं, लाख कोशिशों के बावजूद ।

यह उपमा बहुमुखी है, अनेक स्तरों पर इस का प्रयोग सरल है
व्यक्ति के लिए, समाज के लिए, देश के लिए।
देश, सोचो तो, सुजला सुफला यह मलय-शीतला माँ, यह देश
छिन्न-भिन्न, फिर भी प्राचीन परिचय में सत्ता के चैतन्य का धनी
प्रज्ञा में संहत, स्मृति के मूल से धन्य, काल के बगीचे में।
पर फिर भी विच्छिन्न, चकनाचूर, हजारों दागों से घायल, विकल
मानो देह में सब कुछ तो हो, सिर्फ स्नायु और स्नायु कोष
अभुक्त, अस्वस्थ, कटे हों, शत-शत स्नायु-स्नायु कोष निकम्मे हो,
तभी तो हमारे मन में, यथार्थ जीवन में कबन्ध बिखरे पड़े हैं,
बंगाल में हजारों तरह के हजारों राक्षस, तरह-तरह की छल-क्षमता के
कौशल वाले।
तभी तो आत्मपरिचय नहीं है. व्यक्ति नहीं है सत्ता नहीं है,
लाल-नीले कमलों के देश में आज वर नहीं है,
विधवा के देश में चढ़ती उमर की सुन्दरी के लिए वर नहीं है, सत्ता नहीं है,

जिस सत्ता का स्वप्न मानव-सभ्यता चिरकाल देखती आयी है
आदिम कबीलों के युग से साम्राज्यों के युग तक।
उसी की व्यथा असामान्य क्षमता के चरणों में ला कर डाल देती है
मिथ्या लोभ, ग़लत आत्माभिमान, जिस तरह साम्राज्यलोलप जर्मनी ने
रिल्के के निःसंग युग में नाजियों के दुःस्वप्न के चरणों में चढ़ा दिये थे
वे लोग जिन्होंने अपनी यन्त्रणा से दुर्जय सुन्दर सिम्फनी क्वार्टेट लिखे थे,
न जाने कितने यन्त्रणा-बधिर बेठोफ़ेन,
सैकड़ों वाखनरों के आर्त नाट्यनाद से
न जाने कितने नीत्शे कितने होयलडेरलिन उन्मत्त हो गये थे।
उन दिनों के इतिहास में दिखाई देता है कि इसी के लोभ में आ कर विलायत में
विश्वव्यापी साम्राज्य के कल्पतरु की छाया की एकता निर्मित हुई थी।
कल्पतरु आज सूख गया है, तभी तो इंगलैण्ड के उत्तर में पश्चिम में
स्वायत्त शासन की मांग है,
तभी तो बहुतों को लगता है कि जनन मैथुन मृत्यु इन तीनों के बावजूद
इंगलैण्ड में भी शान्ति नहीं है,
वे सोचते हैं वे हरिजन हैं, स्थापित या विस्थापित, न तो उन का दाय है
न दायित्व ।
दूसरी ओर, इसी लिए आज दिखाई देती है सत्ता की समस्या,
सामूहिकता के सीमित सत्य के, साम्य के सख्य के महादेश में,
इस देश में, उस देश में, देश-देश के व्यक्ति के मुकुल में।

हम सम्राट नहीं हैं, विलायत की अभिजात दुर्गति
स्वप्न में भी हमारे भाग्य में नहीं, यही नहीं, फ्रांस के मान्दारिनों का सा
सुख भी
जो मोटे तौर पर एक सेज से दूसरी सेज तक के विलास में सीमित है,
अल्जीरियाई अवसाद में अस्तित्व की बीट की खोज,
सो भी नितान्त असार इस पाप-पुण्य-हीन देश के
जलते दिनों बुझी रातों में-वह भी हमारे भाग्य में नहीं।

हम नरक में है, यद्यपि हमारे मन में इस की चेतना नहीं है
तभी तो विवाह मण्डली के प्रच्छन्न नरक में आज वर नहीं है,
फिर भी राजा की बेटी और राजा का बेटा नरक की ड्योढ़ी पर
रास्ते में तैयार खड़े हैं अपने स्वागत की प्रतीक्षा में,
सिर्फ स्वभाव के कारण वे प्रतिष्ठा चाहते हैं, प्रतिवाद में,
प्राण चाहते हैं, मान चाहते हैं, अभयवर चाहते हैं, वे ही तो वर-वधू हैं ॥

 

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