स्त्री विमर्श-कविता -संजीव कुमार दुबे -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sanjeev Kumar Dubey 

स्त्री विमर्श-कविता -संजीव कुमार दुबे -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sanjeev Kumar Dubey

 

विदेह की पुत्री, परिणीता
भुवन सुन्दरी, वन में थी,
स्वयंवर के हार की टीस
अब भी राजाओं के मन में थी,
पग पग पर बुराइयाँ ,बाधाएं
कलुष कुरीतियां प्रचलन में थीं
पर वह अनुगामिनी राम की
पति के संकल्पों पर अडिग रही
कंटक पथ हों, वर्षा गर्मी शीत भले हो
घास फूस की झोपड़ में भी सहज रही,
वन की रीति रिवाजों में स्वयं को
अनुपमेय ढाला
शबरी का दीन रसिक भक्ति भाव हो
अनुसूइया का नवधा भक्ति प्याला,
सबने स्त्रियोचित धर्म दीक्षा दी
असुर वृत्तियों की समीक्षा दी
वन पथ पर पति पर कई प्रहार हुए
युद्ध हुआ, और असुर संहार हुए
एक दिन यूँ ही कुटिल चाल न समझ सकी
वह निरपराध , निर्बोध स्त्री हठ में उलझ गयी
स्वर्ण हिरन पर रीझी जब
सोने की लंका में चली गयी.
अपनों की निष्ठा पर संदेह हुआ
तब रावण से छली गयी,
चहुँ ओर गुप्तचरों का फेरा था
लक्ष्मण रेखा पूर्ण सुरक्षित घेरा था
रावण की छद्म चाल से द्रवित हुई
लक्ष्मण रेखा लांघ स्वयं ही भ्रमित हुई
मर्यादा उल्लंघन को स्वीकार किया
क्रूर व्यवस्थाओं का प्रतिकार किया
राम श्रेष्ठ है लंका में वृहद प्रचार किया
अन्तरदृढ हो समयोचित व्यवहार किया
शक्ति श्रोत बन भीषण युद्ध करा डाला
अग्नि शिखा होकर असुरत्व मिटा डाला
स्त्री मर्यादाओं पर युद्ध हुआ
कोई हारा कोई जीता
एक ओर थी सूपर्णखा
सामने वनवासिनी सीता
स्वयं अभीष्टित हो
युग युग का इतिहास बनी
नारी धर्म आलोकित कर
नव सृजन विश्वास बनी
जीवन की विषम विधाओं से परिचित हो
यह राम की इच्छा थी
स्वयं सिद्ध हो बाधाओं से पार हुयी
ये ही अग्नि परीक्षा थी
लक्ष्मण रेखा पार हुई तो
रूक्ष पथों से चलना होगा
स्वयंसिद्ध होना है तो
अग्नि प्रगट कर जलना होगा
चौदह वर्षों के संघर्षों से तप्त हुई
अद्भुत परम पुनीता थी
एकनिष्ठ हो ज्वालाओं से पार हुई
वह राम की सीता थी।

 

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