स्त्रियाँ-भारत-भारती (वर्तमान खण्ड) -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Bharat-Bharti( Vartman Khand) 

स्त्रियाँ-भारत-भारती (वर्तमान खण्ड) -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Bharat-Bharti( Vartman Khand)

 

होगी यहाँ तक कर्कशा क्या लेखनी तू परवशा-
गृह-देवियों की जो हमारी लिख सके तू दुर्दशा?
किस भाँति देखोगे यहाँ, दर्शक! दृगों को मींच लो,
यह दृश्य है क्या देखने का, दृष्टि अपनी खींच लो ॥२२७।।

अनुकूल आद्याशक्ति की सुखदायिनी जो स्फूर्ति है,
सद्धर्म की जो मूर्ति और पवित्रता की पूर्ति है।
नर-जाति की जननी तथा शुभ शान्ति की स्त्रोतस्वती,
हा दैव! नारी-जाति की कैसी यहाँ है दुर्गती ॥२२८।।

होती रहीं गार्गी अनेकों और मैत्रेयी जहाँ,
अब हैं अविद्या-मूर्ति-सी कुल नारियाँ होती वहाँ!
क्या दोष उनका किन्तु जो उनमें गुणों की है कमी?
हा! क्या करें वे जबकि उनको मूर्ख रखते हैं हमीं! ॥२२९॥

बी० ए० गृहस्वामी विदित हैं किन्तु क्या हैं स्वामिनी?
कैसे कहें, हा! हैं अशिक्षारूपिणी वे भामिनी।
अत्युक्ति क्या, दिन-रात का-सा भेद जो इसको कहें ;
दाम्पत्य भाव भला हमारे धाम में कैसे रहें? ॥२३०॥

बहु कुशलता-सूचक कलाएँ जानती थीं जो कभी,
अब कलह-कुशला हैं हमारी गृहिणियाँ प्राय: सभी ।
हा! बन रहे हैं गृह हमारे विग्रह-स्थल से यहाँ,
दो नारियाँ भी हैं जहाँ वाग्बाण बरसेंगे वहाँ ॥२३१॥

रखतीं यही गुण वे कि गन्दे गीत गाना जानतीं,
कुल, शील, लज्जा उस समय कुछ भी नहीं वे मानतीं।
हँसते हुए हम भी अहो ! वे गीत सुनते सब कहीं,
रोदन करो हे भाइयो ! यह बात हँसने की नहीं ॥२३२॥

है ध्यान पति से भी अधिक आभूषणों का अब उन्हें;
तब तुष्ट हों तो हों कि मढ़ दो मण्डनों से जब उन्हें।
है यह उचित ही, क्योंकि जब अज्ञान से हैं दूषिता-
क्या फिर भला आभूषणों से भी न हों वे भूषिता? ॥२३३।।

अत्यल्प भी अपराध पर डंडे उन्हें हम मारते,
पर हेतु उनकी मूर्खता का सोचते न विचारते।
हैं हाय ! दोषी तो स्वयं देते उन्हें हम दण्ड हैं,
आश्चर्य क्या फिर पा रहे जो दु:ख आज अखण्ड हैं ॥२३४||

ऐसी उपेक्षा नारियों की जब स्वयं हम कर रहे,
अपना किया अपराध उनके शीश पर हैं धर रहे।
भागें न क्यों हमसे भला फिर दूर सारी सिद्धियाँ,
पाती स्त्रियाँ आदर जहाँ रहतीं वहीं सब ऋद्धियाँ ॥२३५॥

हम डूबते हैं आप तो अघ के अँधेरे कूप में-
हैं किन्तु रखना चाहते उनको सती के रूप में।
निज दक्षिणांग पुरीष से रखते सदा हम लिप्त हैं,
वामांग में चन्दन चढ़ाना चाहते, विक्षिप्त हैं ! ॥२३६॥

क्या कर नहीं सकतीं भला यदि शिक्षित हों नारियों ?
रण-रङ्ग, राज्य, सु-धर्म-रक्षा, कर चुकीं सुकुमारियाँ ।
लक्ष्मी, अहल्या, बायजाबाई, भवानी, पद्मिनी,
ऐसी अनके देवियाँ हैं आज जा सकती गिनी ॥ २३७ ॥

सोचो नरों से नारियाँ किस बात में हैं कम हुईं ?
मध्यस्थ वे शास्त्रार्थ में हैं भारती के सम हुईं।
हैं धन्य श्वेरी-तुल्य गाथा-कर्त्रियाँ वे सर्वथा,
कवि हो चुकी हैं विज्जका, विजया, मधुरवाणी यथा ।।२३८॥

निज नारियों के साथ यदि कर्त्तव्य अपना पालते,
अज्ञान के गहरे गढ़े में जो न उनको डालते,
तो आज नर यों मूर्ख होकर पतित क्यों होते यहाँ ?
होती जहाँ जैसी स्त्रियाँ वैसे पुरुष होते वहाँ ॥२३९॥

पाले हुए पशु-पक्षियों का ध्यान तो रखते सभी,
पर नारियों की दुर्दशा क्या देखते हैं हम कभी?
हमने स्वयं पशु-वृत्ति का साधन बना डाला उन्हें,
सन्तान-जनने मात्र को वसनान्न दे पाला उन्हें ॥२४०।।

 

Leave a Reply