सो पाखंडी जि काइआ पखाले-सलोक-गुरु नानक देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Nanak Dev Ji

सो पाखंडी जि काइआ पखाले-सलोक-गुरु नानक देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Nanak Dev Ji

सो पाखंडी जि काइआ पखाले ॥
काइआ की अगनि ब्रहमु परजाले ॥
सुपनै बिंदु न देई झरणा ॥
तिसु पाखंडी जरा न मरणा ॥
बोलै चरपटु सति सरूपु ॥
परम तंत महि रेख न रूपु ॥५॥(952)॥

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