सोयी लोहा बिसु बिखै बिबिधि बंधन रूप-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

सोयी लोहा बिसु बिखै बिबिधि बंधन रूप-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

सोयी लोहा बिसु बिखै बिबिधि बंधन रूप
सोयी तउ कंचन जोति पारस प्रसंग है ।
सोयी तउ सिंगार अति सोभत पतिब्रिता कउ
सोयी अभरनु गनिका रचत अंग है ।
सोयी स्वांतिबून्द मिल सागर मुकताफल
सोयी स्वांतबून्द बिख भेटत भुअंग है ।
तैसे मायआ किरत बिरत है बिकार जग
परउपकार गुरसिखन स्रबंग है ॥३८५॥

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