सोनतरी अभी कहाँ आई-वंशीवट सूना है -गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

सोनतरी अभी कहाँ आई-वंशीवट सूना है -गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

सोनतरी अभी कहाँ आई ?

वह जो
तट को छू,
लहर को उछाल गई,
हवा थी,
भूली-बिसरी
किसी अकथ कथा की,
व्यथा थी,
गाई भी रही जो अनगाई!
सोनतरी अभी कहाँ आई ?

बहंगी थी,
नौका नहीं,
छन्द, गीत, कविताएँ
जिनके सहारे उतरे किनारे
मात्र शंख-घोंघे थे
हम जिन्हें समझा किए
मोती-मूंगा-सितारे;
उंचाई बनी हर निचाई!
सोनतरी मगर नहीं आई !!

हम जिसके लिए,
लड़े, झगड़े,
बुजुर्ग आंधी-तूफ़ानों से;
पता जिसका पूछा किये
सागर, सैलाब, जलयानों से-
तपे प्राण, पुतली पथराई!
सोनतरी किंतु नहीं आई!!

हम जिस पर चढ़कर
उतरते पार,
यात्रा सिंगारते
खोलते-
नए-नए क्षितिजों के द्वार,
पछुआ को करती पुरवाई,
सोनतरी वहीं नहीं आई!!

आएगी, आएगी-
सोनतरी
आज नहीं,
कल ज़रूर,
तीरथ बनेगा अस्पृश्य तट
बालू चन्दन-सिन्दूर
तेज से बिछुड़ेगी कब तक तरुणाई!
आई लो आई वह सोनतरी आई!!

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