सोजें-पिनहाँ हो, चश्मे-पुरनम हो-कविता -फ़िराक़ गोरखपुरी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Firaq Gorakhpuri

सोजें-पिनहाँ हो, चश्मे-पुरनम हो-कविता -फ़िराक़ गोरखपुरी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Firaq Gorakhpuri

सोज़े-पिनहाँ हो,चश्मे-पुरनम हो
दिल में अच्छा-बुरा कोई ग़म हो

फिर से तरतीब दें ज़माने को
ऐ ग़में ज़िन्दगी मुनज़्ज़म हो

इन्किलाब आ ही जाएगा इक रोज़
और नज़्में-हयात बरहम हो

ताड़ लेते हैं हम इशारा-ए-चश्म
और मुबहम हो, और मुबहम हो

दर्द ही दर्द की दवा ना बन जाये
ज़ख्म ही ज़ख्मे-दिल का मरहम हो

वो कहाँ जाके अपनी प्यास बुझाए
जिसको आबे-हयात सम हो

कीजिये जो जी में आये ‘फ़िराक़’
लेकिन उसकी खुशी मुकद्दम हो

 

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