सेना में भारत बसता है- अंतर्द्वंद्व एखलाक ग़ाज़ीपुरी-एखलाक ग़ाज़ीपुरी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Akhlaque Gazipuri

सेना में भारत बसता है- अंतर्द्वंद्व एखलाक ग़ाज़ीपुरी-एखलाक ग़ाज़ीपुरी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Akhlaque Gazipuri

अपने उर में पाप का तुम और शिकंजा कसते हो
अविश्वास के नागों से तुम मानवता को डंसते हो
धर्म जाति के नाम पे तुम मूर्खों को लड़वाते हो
सेना में भारत बसता है क्यों उस पर प्रश्न उठाते हो

अपनी कुटिल सियासत से लाशों के अंबार लगाये
हिन्दू मुस्लिम करके तुमने जनता के घरबार जलाये
भारत माँ की छाती पर नफ़रत की फसल उगाते हो
सेना में भारत बसता है क्यों उस पर प्रश्न उठाते हो

राजनीति की कुत्सित चालें चलना अब तुम बंद करो
तुम अन्तर्मन में झाँको अपने खुद से अन्तर्द्वन्द करो
तुम खुद पर प्रश्न उठाओ कैसे इतना गिरते जाते हो
सेना में भारत बसता हैक्यों उस पर प्रश्न उठाते हो

सोचो उस दिन क्या होगा जब सब्र की सीमा टूटेगी
कैसे खुद को बचाओगे जब गगरी पाप की फूटेगी
जागेगा जब वीर सिपाही फिर देखो क्या कर पाते हो
सेना में भारत बसता है क्यों उस पर प्रश्न उठाते हो

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