सेना का अभिमान रहे- अंतर्द्वंद्व एखलाक ग़ाज़ीपुरी-एखलाक ग़ाज़ीपुरी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Akhlaque Gazipuri

सेना का अभिमान रहे- अंतर्द्वंद्व एखलाक ग़ाज़ीपुरी-एखलाक ग़ाज़ीपुरी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Akhlaque Gazipuri

मत फेंको हर चेहरे पर तुम राजनीति की स्याही को
वक्त अभी है रोक लो खुद पर आने वाली तबाही को
जनता को तो मूर्ख बनाकर टुकड़े टुकड़े बाँट चुके
हिंदू मुस्लिम में मत बाँटो भारत के वीर सिपाही को
है देश की रक्षा में तत्पर वो सीना ताने खड़ा हुआ
सह ठंड धूप पानी पत्थर वो सीमा पर अड़ा हुआ
जाति धर्म और जीना मरना सब कुछ उसका देश ही है
देशभक्ति का जज्बा उसके दिल के अंदर गड़ा हुआ
जिसके कारण रक्षित हो उसको मत उकसाओ तुम
अपने रक्षक को हरगिज़ मत खिलवाड़ बनाओ तुम
तुम जैसे सत्ताधीशों से हैं देश के प्रहरी श्रेष्ठ बहुत
सेना का सम्मान करो मत उसका मान गिराओ तुम
खिलवाड़ बने ना राष्ट्र सुरक्षा इसका तुमको ध्यान रहे
हो सेना पर ना छुद्र सियासत इतना तुमको ज्ञान रहे
गंदी सोच के दलदल में आकंठ डूबा लो तुम खुद को
अस्तित्व तुम्हारा मिट जाए पर सेना का अभिमान रहे

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