सृष्टि हो जाये सुरभिमय इसलिए-प्राण गीत-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

सृष्टि हो जाये सुरभिमय इसलिए-प्राण गीत-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

सृष्टि हो जाये सुरभिमय इसलिए
कंटकों में फूल मुस्काता रहा।

जल रही थी हर दिशा अंगार बन,
आग में शिर से नहाई थी पवन,
खाक़-सी खामोश लेटी थी धरा,
अजगरों को छेड़ देता था गगन,
नाश में मधुमास लाने को मगर
कंटकों में फूल मुस्काता रहा।

आंधियाँ आयीं पहाड़ उछालतीं,
बदलियाँ छायीं समुद्र सँभालतीं,
चांद, सूरज, तारकों के शव उठा
बिजलियाँ टूटी चिताएँ बालतीं,
पर सभी ही आफ़तों पर मुस्करा-
कंटकों में फूल मुस्काता रहा।

सामने थी लाश उपवन की पड़ी,
बेकफ़न अर्थी भ्रमर की थी खड़ी,
थी धरी चट्टान जलती होठ पर,
गूँथती थी आंख लोहू की लड़ी,
फूंकने को प्राण लेकिन धूल में-
कंटकों में फूल मुस्काता रहा।

चांद को खोकर हंसा हैं कब गगन
सूर्य से बिछड़ी कहाँ थिरकी किरन !
तोड़ आकर्षण कभी एकाकिनी
है न चल सकती धरा भी एक क्षण,
पर अकेला, सब तरह बिछुड़ा हुआ-
कंटकों में फूल मुस्काता रहा।

हो धरा मुखरित, दिशा हर गा उठे,
सृष्टि में मधुमास फिर लहरा उठे,
हंस उठें सूनी सजल आंखें सभी
मर्त्य मिट्टी से अमृत शरमा उठे,
इसलिए पाकर घृणा भी विश्व से-
विश्व पर मैं प्यार बरसाता रहा।

सृष्टि हो जाये सुरभिमय इसलिए
कंटकों में फूल मुस्काता रहा।

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