सृष्टि की आयोजना-जलते हुए वन का वसन्त-खण्ड तीन-दुष्यंत कुमार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dushyant Kumar

सृष्टि की आयोजना-जलते हुए वन का वसन्त-खण्ड तीन-दुष्यंत कुमार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dushyant Kumar

मैं-जो भी कुछ हाथ में उठाता हूँ
सपने या फूल,
मिट्टी या आग,
कर्म या विराग
मुझे कहीं नहीं ले जाता ।
सिर्फ एक दिग्भ्रम की स्थिति तक,

हल्का-सा कंपन, रोमांच
एक ठण्डा-सा स्पर्श
किसी भाव-विह्वल अतीत की तरह
मेरे भीतर
कंपता-अकुलाता है।
कोई आकार नहीं लेता, हर स्वप्न
मेरी उँगलियों में
सृजनशीलता की झनझनाहट जगाकर
टूट जाता है।

आज
मेरे हाथों में शून्य
और आँखों में अंधकार है,
तुम्हारी आँखों में सपने
और हाथों में सलाइयाँ हैं,
सोचता हूँ
इन इच्छाओं का
कोई आकाश अगर बुन भी गया
तो उसमें क्या होगा?
न चाँद…
न तारे…
न सूर्य का प्रकाश…
आखिर कहाँ सोंस लेगा
हमारा अंश?
यह नन्हा शिशु :-विश्वास ।

कितने अभागे हैं हम दोनों
कि बने एक सृष्टि की आयोजना की।

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