सृजन-क्षण-तार सप्तक -गजानन माधव मुक्तिबोध-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gajanan Madhav Muktibodh 

सृजन-क्षण-तार सप्तक -गजानन माधव मुक्तिबोध-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gajanan Madhav Muktibodh

जो कि तुम्हारे गर्त बने हैं अक्षमता के,
उन पर लहरा कर भरता मैं एक अवज्ञा ।
वही गम्भीर अतल होते हैं,
वे ही सदा अमल होते हैं,
फिर जाती जिन पर वन्या-सी मेरी प्रज्ञा ।
जब कि स्वयं मैं सुज्ञ बना हूँ
अज्ञों का अन्तर पा कर ही,
सदा रहूँ उन का चाकर ही
वे कि जिन्होंने आत्मरक्त से मुझ को सींचा।
कैसे हंस सकता हूँ मैं उन पर ही ।
उन की मर्यादाएँ पा कर
दरिया अमर्याद लहराया,
अपने स्वर में स्वरातीत गीता दुलराता
मैंने अरे उसी को पाया ।
वे अपूर्णताएँ, ईर्ष्याएं
मुझ में घुल कर धुल कर बनतीं सूर्य सनातन,
यह छिछलापन लघु अन्तर का
क्षण-क्षण नूतन को करता है शीघ्र पुरातन: ।
यों नूतन की विजय चिरन्तन,
महामरण पर महाजन्म का उदय क्षिप्रतर,
महाभयंकर से बहता है परम शुभंकर ।

जो खण्डित औ’ भग्न रहे हैं,
वे अखण्ड देवता उन्हीं के
मुझ में आ कर मग्न हुए हैं।
ये आँसू, ये चिन्ता के क्षण मुझ में आ कर, पा परिवर्तन
जग के सम्मुख नग्न हुए हैं ।

ओ रे, भग्न नग्न मलिनों के
खण्डित उग्र विकल के सागर,
ओ कुरूप वीभत्स सनातन
की प्रतिनिधि प्रतिभा के आगर,
अरे, अशिव बौने मस्तक के
चिरविद्रूप स्वप्न आत्मान्तक,
अरे अमंगल हास, घृणित आनन्द,
मरण के सदा उपासक,
भय मत खायो, अरे पिशाचो,
जब कि सत्य तुम बने हुए हो ।
अन्धकार में, किसी आड़ में,
किसी झाड़ की छाया में तुम
क्यों छिपते हो ? अरे भयंकर
द्रण-से जग की काया में तुम !
मैं स्वागत करता हूँ सबका,

क्योंकि प्रकृति से सूर्य-सत्य हूं।
और जब कि तुम भव्य तने हो
मुझ में जलते स्वर्न बनोगे
ज्वालायों का नग्न नृत्य हूं,

नभ की पृष्ठभूमि पर मेरी ज्वाला की छाया फिरती है,
काल झुलसता है, मुझ से सब तस्वीरें बनती गिरती हैँ।

पर यह कैसे ? जब कि तुम्हारे
लिए बना हूँ मैं प्रखर-प्रभ,
मेरे स्वर्ण-स्पर्श से आकुल
होता है अपार जीवन-नभ ।

मैं उत्साह अनन्त, और तुम क्यों उदास अति अक्षम ?
मेरी ममता हो जाती है पर कठोर औ’ निर्मम ।
गर्वशील मुझ को मत समझो,
किन्तु भार गुरु पा कर मैं भी
निज नयनों में हुआ भव्य हूं, उत्साहत हूँ ।
यह उत्साह सफ़ेद ज्वाल है
जो कि कलुष का महाकाल है,

इसमें पइ कर तुम भी श्वेत बनोगे तप कर।
नाप कौन पायेगा तुम को
आओगे जब इससे नप कर ।

मैं केवल तुम पर जीवित हूँ
मेरी सांस, किन्तु तेरा तन,
मेरी आस और तेरा मन,
तू है हृदय और मैं लोचन
मैं हूँ पूर्ण, अपूर्ण झेल कर ।
मैं अखण्ड, खण्डित प्रतिभा पर ।

मैं मैली आँखों के अन्दर ज्योति गुप्त हूँ ।
मैं मैले अन्तर के तल में
घन सुषुप्त आत्मा प्रतप्त हूँ।

मैं हूँ नम्र धुनि के कण-सा,
मैं अजस्र पृथ्वी के मन-सा,
घन मृत्कण में सृजन-क्षण मैं,
मलिनों में रह अग्नि-बिन्दु हूं,
जीवन की सौन्दर्य-शान्ति में
नभोविहारी शरद-इन्दु हूँ।

शुभ्रारुण किरणों से बिम्बित
रजत-नील सर उत्कट उज्जवल
जिस में अनलोर्मिल, अनिलोर्मिल
कमल खिले है वे रक्तोत्पल ।

मनोमूर्ति यह चिरप्रतीक है ।
ध्येय-धृष्ट उर की ज्वालामय ।
मेरी प्रज्ञा का सृजन-क्षण
ऐसा उष्ण शुभंकर तन्मय ।

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