सूली चढ़ी हैं बस्तियों की बस्तियां-ग़ज़लें-ख़याल लद्दाखी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Khayal Ladakhi

सूली चढ़ी हैं बस्तियों की बस्तियां-ग़ज़लें-ख़याल लद्दाखी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Khayal Ladakhi

सूली चढ़ी हैं बस्तियों की बस्तियां
आदाब ऐ किरदार ए मरग ए नागहां

है किस के हाथों में क़लम तलवार सी
है कौन जो लिखता लहू से दास्तां

होता नहीं है अब दुआओं का असर
आलम जहां की बनदगी है बेज़ुबां

है चार जानिब मौत का मनज़र बपा
तुरबत में करती है जवानी आशियां

क्या ख़ाक कोई जी रहा है ज़िन्दगी
गरदन रसन ज़हनों में ग़म की बेड़ियां

इनसान का ही ख़ौफ़ है इनसान को
फिर भी ख़ुदा इनसानियत पर महरबां

महमां सही हम चार दिन के ही मगर
क्यों कर हुई है मौत अब के मेज़बां

जिन के इशारों पर क़ज़ा थी नाचती
है ख़ाक में लिपटी हुई वह हस्तियां

जिस शहर में थी खिलखिलाती शोख़ियां
बसती हैं आकर वां ख़याल अब सिस्कियां

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