सूर्यास्त वेला में-स्मृति सत्ता भविष्यत् -विष्णु दे -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Vishnu Dey 

सूर्यास्त वेला में-स्मृति सत्ता भविष्यत् -विष्णु दे -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Vishnu Dey

 

गरमी का झुलसा दिन, जा कर भी नहीं जाता।
जारुल के फूलों के बीच बच्चों का खेल
थमने में ही नहीं आता, मैं कहता हूँ : धुन ही तो है
अभी तो मैं मौजूद हूँ; फूल और ढेले-
यही तो खिलौने हैं, और सूर्यास्त का उजाला-
और कुछ पके बाल मेरे सिर के ।
खेलते हैं तो खेलें, माता-पिता स्वयं निश्चिन्त हो कर
प्यार कर लें, घर के अहाते में
मैं जो मौजूद हूँ, मन लगा कर आँखें गड़ाये देख रहा हूँ।
देख रहा हूँ दोनों बच्चे पेड़ की पत्तियों, फूलों
और घास से मिल कर एकाकार हो गये है। सूर्यास्त-वेला में
शायद यही मनुष्य का जीवन्त आईना है ?

१४/२/५८

 

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