सूरज की जात नहीं होती-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

सूरज की जात नहीं होती-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

 

(महाकवि वाल्मीकि जी को स्मरण करते हुए)

उसके हाथ का
मोरपंख कागज़ों पर था नाचता
पन्नों पर थिरकता
इतिहास रचता
पहले महाकवि का निर्माता।
किसी के लिए ऋषी
किसी के लिए महाऋषि
कुचलों बेसहारों के लिए
पहला भगवान था मुक्तिदाता।
स्वाभिमान का ऊँचा दुमंजिला स्तंभ।

न नीचा न ऊँचा
मानसिकता से
बहुत ऊँचा और अलग
रौशन सबक था वक़्त के पन्ने पर।
त्रिकालदर्शी माथा
फैल गया चौबीस हज़ार श्लोकों में
घोल कर पूरा खुद को
इतिहास हो गया।

ईसवीं के पहले पन्नों पर
उसने लकीरें नहीं, पदचिन्ह बनाए।
काले अक्षरों ने पूरब को
भगवान दिखाया पहली बार।
ज्ञान सागर का गोताखोर
माणिक मोती ढूँढ-ढूँढ पिरोता रहा।
अजब मार्गदर्शक।

उसके कारनामों पर
इबारत लिखना
ख़ाला जी का बाड़ा नहीं है।
सारी दुनिया के कागज़ से बना
छोटा रह गया पन्ना
आदि कवि के समक्ष
समंदर स्याही की दवात।
मोरपंख लिखता रहा
वक़्त के पन्नों पे
अर्थों के अर्थ करते रहो
दोस्तो! सूरज को आप
नहीं बना सकते दिया।

विश्वकीर्ति के चलते ही
सवदेसी पाठ बन गए
सर्वकालिक सूर्यलोकित माथा।
धरती की हर ज़बान में
चमचमाता चमकदार ग्रँथ।

सूरज को
किसी भी तरीके से देखो
सूरज ही रहता है
न उतरता न चढ़ता
तुम ही ऊपर नीचे होते हो।
तपते खपते मरने वाले हो
समझने की कोशिश में इसकी जात।
बच्चे न बनों
सूरज सूरज ही रहता है।
इस की जात नहीं
झलक होती है।
जिधर मुँह करता है
दिन होता है, फूल खिलते हैं।
रँग भरते हैं, राग छिड़ते हैं।
पीठ करे तो लंबी घनेरी रात।

इसे अपने जितना मत करो
लगातार काट-छाँट
ये तुम्हारी मापक मशीनों से
बहुत बड़ा है।
इसमें मनमर्ज़ी के रंग भरते
इसका रंग नहीं
रौशन ढंग होता है
जगमगाने वाला
नूर के घूँट भरो, ध्यान धरो।
अपने जितना छोटा न करो।
रंग, जात, गोत्र, धर्म, नस्ल
से बहुत ऊँचा है कवि आदि कवि
सूरज की जात पात नहीं
सर्वकल्याणकारी औकात होती है
तभी उसके आने पर
प्रभात होती है।

 

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