सुरेश चन्द -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Suresh Chand Part 2

सुरेश चन्द -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Suresh Chand Part 2

हम उन्हें अच्छे नहीं लगते

इस शस्य श्यामला भारत भूमि की
हर चीज उन्हें अच्छी लगती है
नदी, झरने, ताल-तलैया, सब कुछ….

पीले-पीले सरसों हों
या बौर से लदी अमरायी
या फिर
हमारे खून पसीने से लहलहाती फसल
सब कुछ उन्हें बहुत भाती है

हमारे श्रम से बनी
ऊँची-ऊँची अट्टालिकायें
उन्हें बहुत सुकून देती हैं

पीपल का वृक्ष हो या
तुलसी का पौधा
या फिर दूध पीती पाषाण मूर्तियाँ
इन सबकी उपासना उन्हें अच्छी लगती है
पर हम उन्हें अच्छे नहीं लगते
सिनेमा हाल में एक ही कतार में बैठकर
हम फ़िल्में देखते हैं जरूर
पर चारपाई पर बैठकर
हमारा पढ़ना-लिखना उन्हें अपमानजनक लगता है
हम भी हैं इसी वसुंधरा की उपज
यह देश हमारा भी है जितना कि उनका है
परन्तु खिलखिलाते हुए हमारे बच्चे
उन्हें अच्छे नहीं लगते

खेतों में काम करती हुई
हमारी बहू-बेटियां
उनकी पिशाच वासनाओं का शिकार होती हैं
और हमारी सरकारी नौकरी
उनकी आँखों की किरकिरी है

हम घर में हों या बाहर
बस से यात्रा कर रहे हों
या फिर ट्रेन से
किसी संगीत सभा में हों
या स्कूल में
वे जानना चाहते हैं सबसे पहले
हमारी जाति
क्योंकि सिर्फ उनको ही पता है
हमारी नीची जाति होने का रहस्य

वे चाहते हैं कि
हम उनके सामने झुक के चलें
झुक कर रहें
झुक कर जियें
एक आज्ञा पालक गुलाम की तरह

ओ काली घटा (गीत)

ओ काली घटा मेरे आँगन आ
तू मेरी सहेली बन जा रे !

है सूखी धरती, प्यासी धरती
धरती सूख कर हो गयी परती
इस परती में रिमझिम-रिमझिम
प्यार के आँसू बरसा जा रे !

नदियाँ सूखी, प्यासे झरने
सूख रहे सब तृण-तृण हैं
झुलस रहीं खेतों में फसलें
पशु, जन, खग सब क्रंदन हैं

अपने मृदु वाणी से, हे सखि !
क्रंदन को गुंजन कर जा रे !!

सब बाल सखा मिल खेल रहे
हैं, काच-कचौटी कीचड़ में
सखियाँ कजरी गा रही हैं-
डगर-डगर घर आँगन में

इन मुरझाये सूखे होठों पर
खुशियों के गीत बिछा जा रे !

एक गीत लाया हूँ मैं अपने गाँव से-गीत

एक गीत लाया हूँ मैं अपने गाँव से।
धूल भरी पगडण्डी पीपल की छाँव से।

शब्दों में इसकी थोड़ी ठिठोली है
भौजी ननदिया की यह हमजोली है
‘माई’ के प्यार भरल अँचरा के छाँव से।

लहराए खेतों में सरसो के फूल
ग्रीष्म, वर्षा, शीत सब मुझको क़बूल
कीचड़ में सने हुए हलधर के पाँव से।

खुला आसमान मेरा चाँद औ’ सितारे
पुरवइया बहती है अँगना दुआरे
मिट्टी के चूल्हे पर जलते अलाव से।

होत भिनुसार बोले सगरो चिरइया
अँगना में खूँटे पर रम्भाये गइया
कोयल के कुहू-कुहू कागा के काँव से।
एक गीत लाया हूँ मैं अपने गाँव से।

बाबा साहब डा. अंबेडकर के प्रति

अपने समय के
चमकते सूर्य थे वे
पूरी मानव जाति के लिए
ज्ञान प्रकाश बिखेरते
उदित हुए थे –
इस जमीं पर
और लड़ते रहे
आखिरी सांस तक
….शोषण, ज़ुल्म, अन्याय के विरुद्ध

काँटों के साथ
गुलाब की तरह हँसना
कीचड़ में पलकर
कमल की तरह खिलना
धूल में जीकर
शूर की तरह रहना
उनकी नियति थी

वे हमारे लिए
अँधेरी गुफा में
जलती मशाल थे

वे गरीबों के वैभव थे
दलितों के प्राण शक्ति
वे सचमुच हमारे नेता थे
वे हमारे लिए ही जीये

उनका पुरुषत्व
उनकी मर्यादा
उनका स्वाभिमान
उनके अरमान
उनका प्यार
आज भी
इस मिट्टी के कण-कण में मौजूद है

जब तक यह मिट्टी रहेगी
जब तक जीवित रहेगा यह भारत वर्ष
तब तक
उनके ताप को, ऊर्जा को, अग्नि को
हम अपने सीने से महफूज़ रखेंगे

उनके आदर्श
उनकी प्रेरणा
उनका बलिदान
उनका त्याग
देदीप्यमान नक्षत्र बनकर
इस समाज को
इस जहान को
अनंत काल तक
आलोकित करता रहेगा

हे प्रकाश पुंज !
दलितों के मसीहा
मानवाधिकार के चैतन्य पुरुष
लोकतांत्रिक समाजवाद के उन्नायक
अर्पित है तुझे हमारा शत्-शत् नमन !!

हिन्दी जन की बोली है (गीत)

हिन्दी जन की बोली है
हम सब की हमजोली है

खेत और खलिहान की बातें
अपने घर संसार की बातें
उत्तर-दक्षिण फर्क मिटाती
करती केवल प्यार की बातें

हर भाषा की सगी बहिनिया
यह सबकी मुँह बोली है

हिन्दी है पहचान हमारी
हमको दिलो जान सी प्यारी
हिन्दी अपनी माँ सी न्यारी
हिन्दी है अभिमान हमारी

हिन्दी अपने देश की धड़कन
अपने दिल की बोली है

आओ मिलकर ‘प्यार’ लिख दें
मन की उजली दीवारों पे
पानी का छींटा दे मारें
नफ़रत के जलते अंगारों पे

यही भावना घर-घर बाँटें
हिन्दी सखी-सहेली है

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