सुदामा पाण्डे का प्रजातंत्र (एक)-सुदामा पाण्डे का प्रजातंत्र-सुदामा पांडेय धूमिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sudama Panday Dhoomil

सुदामा पाण्डे का प्रजातंत्र (एक)-सुदामा पाण्डे का प्रजातंत्र-सुदामा पांडेय धूमिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sudama Panday Dhoomil

सेर भर कबाब हो
एक अद्धा शराब हो
नूरजहाँ का राज हो
ख़ूब हो–
भले ही ख़राब हो

(एक लोकगीत)

भेंट
कल सुदामा पांड़े मिले थे
हरहुआ बाज़ार में । ख़ुश थे । बबूल के
वन में वसन्त से खिले थे ।
फटकारते हुए बोले, यार ! ख़ूब हो
देखते हो और कतराने लगते हो,
गोया दोस्ती न हुई, चलती-फिरती हुई ऊब हो
आदमी देखते हो, सूख जाते हो
पानी देखते हो गाने लगते हो ।
वे ज़ोर से हँसे । मैं भी हँसा ।
संत के हाथ–बुरा आ फँसा

सोचा–
उन्होंने मुझे कोंचा । क्या सोचते हो ?
रात-दिन
बेमतलब बवंडर का बाल नोचते हो
ले देकर एक अदद
चुप हो ।

वक़्त को गंजेड़ी की तरह फूँकते रहे हो
चेहरे पर चमाईन मूत गई है । इतनी फटकार
जैसे वर्षों से अपनी आँखों में थूकते रहे हो
अरे यार, दुनिया में क्या रखा है ?
खाओ-पियो, मज़ा लो
विजयी बनो–विजया लो
रंगरती
ठेंगे पर चढ़े करोड़पति ।

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