सुतंतुस-इदं न मम-भवानी प्रसाद मिश्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhawani Prasad Mishra 

सुतंतुस-इदं न मम-भवानी प्रसाद मिश्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhawani Prasad Mishra

 

जैसे किसी ने
मन के बखिए
उघेड़ दिए
सब खुल गया
लगा मैं कुल का कुल
गया
भीतर
कुछ भी
बचा नहीं है
तब मैंने
यह
मानकर
कि भीतर मन के सिवा
और-और तत्व होंगे
उन तत्वों को टेरा
बाहर के जाने हुए
तत्वों का रूख़ भी
भीतर की तरफ़ फेरा
और अब
सब
रफ़ू किया जा रहा है
समूचा जीवन
नये सिरे से
जिया जा रहा है!

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