सुखमंगल सिंह -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sukhmangal Singh Part 1

सुखमंगल सिंह -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sukhmangal Singh Part 1

मर्यादा

जीवन काल का मरम – सत्य
सुबह – सुबह हमें बताती ।
गौरव गाथा हमें पढ़ाने
मर्यादा ही पहले आती ।
मन से वचन और कर्म से
बेदी पाठ हमें पढ़ाती ।
ऊषाकाल के महत्व को
भोर मेन ही हमें जनाती ।
अरमानों भरा यह जीवन
मर्यादा ही हमें सिखाती।।

जल पीना औरपिलाना

सिल गये हों होठ तो भी गनगुनाना चाहिए
रोना-धोना भूल करमुस्कराना चाहिए ।

विद्रोही की ज्वाला भड़क उट्ठी है क्या ?
खुद समझ कर बाद में सबको बताना चाहिए ।

बस्तियों में फिर चरागों को जलाने वास्ते
महलों के दीपक कभी भी ना बुझाना चाहिए ।

अम्नो-अमन की नदियां अवच्छ हों बहें,
और वही जल पीना औ’ पिलाना चाहिए ।।

झूला

झूला झूल रहे नन्द के कुमार सखी
कदमों की डार सखी ना !
झूला बना अलबेला, झूलें नन्द के गदेला
हीरा मोती लगल रेशम की डार सखी ।
कदमों की डार सखी ना !!
एक तो घेरे घटा काली, दूजे बूंद पड़े प्यारी
तीजे पुरुया के बहेला बयार सखी
कदमों की डार सखी ना !!
झूला झूल रहे नन्द के कुमार सखी
कदमों की डार सखी ना !!

हे ! मां सरयू तुम्हें प्रणाम

हे ! मां सरयू तुम्हें प्रणाम

बांचे वेद – शास्त्र हर द्वारे
धरा को लहर – लहर सँवारे
भक्ति -शक्ति का पाठ पढ़ाके
मां सरयू तू हमें उबारे
तुझसे सम्पन्न अयोध्या धाम
हे ! मां सरयू तुम्हें प्रणाम

तुझसे हर्षित हर कण कण है
रूजन में मेरा हर क्षण है
लहर से तेरी निकली ध्वनि ही
कविता -कला का निर्मल मन है
बड़ा बन गया छोटा नाम
हे ! मां सरयू तुम्हें प्रणाम

श्री हनुमत आज्ञा पाकर के
तुझमें जो डुबकी लगाता
कई जन्मों के पाप धूल जाते
स्वर्ग में जाके जगह वो पाता
कहते हैं जिसको सुरधाम
हे ! मां सरयू तुम्हें प्रणाम

युद्ध -कला -पारंगत करता
धर्मराज का पाठ पढ़ाती
संत – हितों की रक्षा खातिर
तपसी -रूप के भेद बताती
चलती सत्य का दामन थाम
हे ! मां सरयू तुम्हें प्रणाम

शिष्टता -चारित्रिक शुद्धता
आदर- विश्वास का भाव जगाती
राम – लखन -भरत – शत्रुघ्न को
प्रतिपल निरख – निरख इठलाती
भजती रहती सुबहो – शाम
हे ! मां सरयू तुम्हें प्रणाम

विनम्रता की माला पहन के
विष्णु – पग – नख से तूं निकली
सुवर्ण मणि मुक्ता जड़ित अयोध्या
की ओर तूं निकल चली
देशो – दिशा तेरा गुणगान
हे ! मां सरयू तुम्हें प्रणाम

कोने – कोने ज्ञान भरें

हरियाली घर आंगन आये दिल से आओ प्यार करें
गगन के पक्षी डाल डाल से कलरव करगुणगान करें ।
कोयल की मीठीवाणी संगकागा बैठा ध्यान करे
भीतर अभिलाषा लेकर मन में कोने- कोनेज्ञान भरें ।
लछिमन चिड़िया ‘मंगल ‘ गाए गादीबैठे झाँक लगाए
लाल – गुलाबी, नीली -पीली धानीमानी वसन बनाये ।
मूल भूत पाषाण शिलायें उठकर खुद नाम लिखाएं
विविध यतन के दाना डालें उँघे धरातल जाल विछाएँ ।
नहीं कहीं कोलाहल हो हरियाली का जाल बिछायें ।।

कतकी में माई पुकारत बानी ,सरयू -संस्कृति संवारती

भोरवैंसे मइया तिखारत बानी
तकती अँखियन से, मइया निहारत बानी
कतकी नहान आइल बा,दुलारतबानी
सरयू मइया तोहरा के पुकारत बानी ।

कंजड़ मानसिकता पर विचारात बानी
शासन की सिथिलता पे धिक्कारत बानी
उठ भोरावैं मइया तिखारत बानी
घृणा और भय का पात्र पखारत बानी ।

लोक संस्कृति- लोकभाषा में पुकारत बानी
आंचलिक ग्राम साहित्य सवांरत बानी
लोकरंग – लोक गंध ले पुकारत बानी
यथार्थ सृजन के लिये ललकारत बानी ।

भूमण्डलीयकरण में माई निहारत बानी
हराम जीवन का गौरव निखारत बानी
अँधेरे में माई निरंतर -निसारतबानी
धरा पे धार से मइया धिक्कारत बानी ।

गावों भी को उपेक्षा से माई उबारत बानी
धर्म पालन में लरिकन के निकारत बानी
माई रात – दिन लहरन से सँवारत बानी
वेद – शास्त्र पढ़े – बदे ललकारत बानी।

सच्चे मित्र से सदा व्यवहार निभाना चाहिए

मौसम की भांति बदलते मित्र को, मित्र नहीं बनाना चाहिए ।
जीवन में आने वाली तकलीफों से, नहीं घबराना चाहिए ।
सच सत्यसे रूठने वाले लोगों को, नहीं मनाना चाहिए ।
नज़रों से गिर जाए जो उसे, नहीं उठाना चाहिए ।
पचे जो ना भोजन उसे नहीं खाना चाहिए ।
बातें जो मानता न हो, नहीं समझाना चाहिए ।
क्रंदन होता जहां सदा, वहां नहीं जाना चाहिए ।
कपट करने वालों से कभी, मेल नहीं बढ़ाना चाहिए ।
सच्चे मित्र से सदा, व्यवहार निभाना चाहिए ।

 

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