सिरीरागु त्रिलोचन का-शब्द -भक्त त्रिलोचन जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Bhakt Trilochan Ji

सिरीरागु त्रिलोचन का-शब्द -भक्त त्रिलोचन जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Bhakt Trilochan Ji

माइआ मोहु मनि आगलड़ा प्राणी जरा मरणु भउ विसरि गइआ ॥
कुट्मबु देखि बिगसहि कमला जिउ पर घरि जोहहि कपट नरा ॥१॥
दूड़ा आइओहि जमहि तणा ॥
तिन आगलड़ै मै रहणु न जाइ ॥
कोई कोई साजणु आइ कहै ॥
मिलु मेरे बीठुला लै बाहड़ी वलाइ ॥
मिलु मेरे रमईआ मै लेहि छडाइ ॥१॥ रहाउ ॥
अनिक अनिक भोग राज बिसरे प्राणी संसार सागर पै अमरु भइआ ॥
माइआ मूठा चेतसि नाही जनमु गवाइओ आलसीआ ॥२॥
बिखम घोर पंथि चालणा प्राणी रवि ससि तह न प्रवेसं ॥
माइआ मोहु तब बिसरि गइआ जां तजीअले संसारं ॥३॥
आजु मेरै मनि प्रगटु भइआ है पेखीअले धरमराओ ॥
तह कर दल करनि महाबली तिन आगलड़ै मै रहणु न जाइ ॥४॥
जे को मूं उपदेसु करतु है ता वणि त्रिणि रतड़ा नाराइणा ॥
ऐ जी तूं आपे सभ किछु जाणदा बदति त्रिलोचनु रामईआ ॥५॥२॥९२॥

 

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