सिपाही का मरसिया-सरे-वादी-ए-सीना -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz 

सिपाही का मरसिया-सरे-वादी-ए-सीना -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz

उट्ठो अब माटी से उट्ठो
जागो मेरे लाल
अब जागो मेरे लाल
तुमहारी सेज सजावन कारन
देखो आई रैन अंध्यारन
नीले शाल-दोशाले लेकर
इनमें इन दुखीयन अंखीयन ने
ढेर किये हैं इतने मोती
इतने मोती जिन की जयोती
दान से तुम्हरा, जगमग लागा
नाम चमकने

उट्ठो अब माटी से उट्ठो
जागो मेरे लाल
अब जागो मेरे लाल
घर-घर बिखरा भोर का कुन्दन
घोर अंधेरा अपना आंगन
जाने कब से राह तके हैं
बाली दुलहनीया, बांके वीरन
सूना तुम्हरा राज पड़ा है
देखो कितना काज पड़ा है

बैरी बिराजे राज सिंहासन
तुम माटी में लाल
उट्ठो अब माटी से उट्ठो, जागो मेरे लाल
हठ न करो माटी से उट्ठो, जागो मेरे लाल
अब जागो मेरे लाल

अकतूबर, १९६५

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