सितार वादन सुनते हुए-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

सितार वादन सुनते हुए-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

 

सितार उँगलियों के पपोटों से नहीं
अँतड़ियों के साथ से बजता है।
सुर लहरी सिरजती कंपन
रूह का राग अलापती।
कण कण में आनंद घोलती।
ब्रह्मांड के कान जागते
वृक्ष झूमते श्रोताओं की तरह।
नेत्र नम होते देखे हैं मैंने।

तारों के पास
अँतड़ियों जितना दर्द होता है।
कभी न ऊबतीं।
कभी न थकतीं।
लोगों के ख्याल में गाती हैं।
वह तो दर्द सुनाती हैं।
आहों को ज़बान लगाती हैं
अनकहा सुनाती हैं।
बहुत कुछ समझाती हैं।

दिल के बहुत करीब होता है
तरल-सा दर्द-निवास
पारे-सा डालेता
तारों के कंपन-सा रागवंता।

तुमने कभी झील के ठहरे पानी की छाती पर
ठीकरी छिछुली की तरह चलाई है?
शायद नहीं
यदि चलाई होती तो निथरे पानी पर
नाचती स्वर लहरियों को
तुमने झट पहचान लेना था
कि यह बचपन के समय
सितार से अलग हुईं जुड़वा बहनें हैं।
एक जैसे स्वभाव वालियाँ,
तरल चंचल तरबज़ादियाँ।
मुझे सितार बादन सुनना
बहुत अच्छा लगता है।
मेरी अँतड़ियों से इसका
आदि युगादि रिश्ता लगता है।
मेरे लिए सितार साज़ नहीं
धरती का आत्म वादन है।
इसमें शामिल है मेरी तेरी
सबकी अँतड़ियों की डोरें।

यदि तुम्हारी अँतड़ियों की डोर जीवित है
तो तुम सितार
सुनने के लिए बैठ जाओ।
नहीं तो वक्त जाया न करो।
अपने जिस्म में से निकलो!
यह साज़ मेले की भीड़ में नहीं बजता।
स्वयं में से शोर खारिज़ करके
सुना जाता है।

 

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