सिंहलद्वीप-खंड-पद्मावत -मलिक मुहम्मद जायसी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Malik Muhammad Jayasi

सिंहलद्वीप-खंड-पद्मावत -मलिक मुहम्मद जायसी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Malik Muhammad Jayasi

पूछा राजै कहु गुरु सूआ । न जनौं आजु कहाँ दहुँ ऊआ ॥
पौन बास सीतल लेइ आवा । कया दहत चंदनु जनु लावा ॥
कबहुँ न एस जुड़ान सरीरू । परा अगिनि महँ मलय-समीरू ॥
निकसत आव किरिन-रविरेखा । तिमिर गए निरमल जग देखा ॥
उठै मेघ अस जानहुँ आगे । चमकै बीजु गगन पर लागै ॥
तेहि ऊपर जनु ससि परगासा । औ सो चंद कचपची गरासा ॥
और नखत चहुँ दिसि उजियारे । ठावहिं ठाँव दीप अस बारे ॥

और दखिन दिसि नीयरे कंचन-मेरु देखाव ।
जनु बसंत ऋतु आवै तैसि तैसि बास जग आव ॥1॥

 

तूँ राजा जस बिकरम आदी । तू हरिचंद बैन सतबादी ॥
गोपिचंद तुइँ जीता जोगू । औ भरथरी न पूज बियोगू ॥
गोरख सिद्धि दीन्ह तोहि हाथू । तारी गुरू मछंदरनाथू ॥
जीत पेम तुइँ भूमि अकासू । दीठि परा सिंघल-कबिलासू ॥
वह जो मेघ गढ़ लाग अकासा । बिजुरी कनय-कोट चहु पासा ॥
तेहि पर ससि जो कचपचि भरा । राजमंदिर सोने नग जरा ॥
और जो नखत देख चहुँ पासा । सब रानिन्ह कै आहिं अवासा ॥

गगन सरोवर, ससि-कँवल कुमुद-तराइन्ह पास ।
तू रवि उआ, भौंर होइ पौन मिला लेइ बास ॥2॥

 

सो गढ़ देखु गगन तें ऊँचा । नैनन्ह देखा, कर न पहुँचा ॥
बिजुरी चक्र फिरै चहुँ फेरी । औ जमकात फिरै जम केरी ॥
धाइ जो बाजा कै मन साधा । मारा चक्र भएउ दुइ आधा ॥
चाँद सुरुज औ नखत तराईं । तेहि डर अँतरिख फिरहिं सबाई ॥
पौन जाइ तहँ पहुँचै चहा । मारा तैस लोटि भुइँ रहा ॥
अगिनि उठी, जरि बुझी निआना । धुआँ उठा, उठि बीच बिलाना ॥
पानि उठा उठि जाइ न छूआ । बहुरा रोइ, आइ भुइँ चूआ ॥

रावन चहा सौंह होइ उतरि गए दस माथ ।
संकर धरा लिलाट भुइँ और को जोगीनाथ?॥3॥

 

तहाँ देखु पदमावति रामा । भौंर न जाइ, न पंखी नामा ॥
अब तोहि देउँ सिद्धि एक जोगू । पहिले दरस होइ, तब भोगू ॥
कंचन-मेरु देखाव सो जहाँ । महादेव कर मंडप तहाँ ॥
ओहि-क खंड जस परबत मेरू । मेरुहि लागि होइ अति फेरू ॥
माघ मास, पाछिल पछ लागे । सिरी-पंचिमी होइहि आगे ॥
उघरहि महादेव कर बारू । पूजिहि जाइ सकल संसारू ॥
पदमावति पुनि पूजै आवा । होइहि एहि मिस दीठि-मेरावा ॥

तुम्ह गौनहु ओहि मंडप, हौं पदमावति पास ।
पूजै आइ बसंत जब तब पूजै मन-आस ॥4॥

 

राजै कहा दरस जौं पावौं । परबत काह, गगन कहँ धावौं ॥
जेहि परबत पर दरसन लहना । सिर सौं चढ़ौं, पाँव का कहना ॥
मोहूँ भावै ऊँचै ठाऊँ । ऊँचै लेउँ पिरीतम नाऊँ ॥
पुरुषहि चाहिय ऊँच हियाऊ । दिन दिन ऊँचे राखै पाऊ ॥
सदा ऊँच पै सेइय बारा । ऊँचै सौ कीजिय बेवहारा ॥
ऊँचै चढ़ै, ऊँच खँड सूझा । ऊँचे पास ऊँच मति बूझा ॥
ऊँचे सँग संगति निति कीजै । ऊँचे काज जीउ पुनि दीजै ॥

दिन दिन ऊँच होइ सो जेहि ऊँचे पर चाउ ।
ऊँचे चढ़त जो खसि परै ऊँच न छाँड़िय काउ ॥5॥

 

हीरामन देइ बचा कहानी । चला जहाँ पदमावति रानी ॥
राजा चला सँवरि सो लता । परबत कहँ जो चला परबता ॥
का परबत चढ़ि देखै राजा । ऊँच मँडप सोने सब साजा ॥
अमृत सदाफर फरे अपूरी । औ तहँ लागि सजीवन-मूरी ॥
चौमुख मंडप चहूँ केवारा । बैठे देवता चहूँ दुवारा ॥
भीतर मँडप चारि खँभ लागे । जिन्ह वै छुए पाप तिन्ह भागे ॥
संख घंट घन बाजहिं सोई । औ बहु होम जाप तहँ होई ॥

महादेव कर मंडप जग मानुस तहँ आव ।
जस हींछा मन जेहि के सो तैसे फल पाव ॥6॥

 

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