साहिर लुधियानवी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sahir Ludhianvi Part 4

साहिर लुधियानवी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sahir Ludhianvi Part 4

अब अगर हमसे ख़ुदाई भी खफ़ा हो जाए

अब अगर हमसे ख़ुदाई भी खफ़ा हो जाए
गैर-मुमकिन है कि दिल दिल से जुदा हो जाए
जिस्म मिट जाए कि अब जान फ़ना हो जाए
गैर-मुमकिन है…

जिस घड़ी मुझको पुकारेंगी तुम्हारी बाँहें
रोक पाएँगी न सहरा की सुलगती राहें
चाहे हर साँस झुलसने की सज़ा हो जाए
गैर-मुमकिन है…

लाख ज़ंजीरों में जकड़ें ये ज़माने वाले
तोड़ कर बन्द निकल आएँगे आने वाले
शर्त इतनी है कि तू जलवा-नुमाँ हो जाए
गैर-मुमकिन है…

ज़लज़ले आएँ गरज़दार घटाएँ घेरें
खंदकें राह में हों तेज़ हवाएँ घेरें
चाहे दुनिया में क़यामत ही बपा हो जाए
गैर-मुमकिन है…

अभी न जाओ छोड़ कर के दिल अभी भरा नहीं

अभी न जाओ छोड़ कर के दिल अभी भरा नहीं
अभी अभी तो आई हो अभी अभी तो
अभी अभी तो आई हो, बहार बनके छाई हो
हवा ज़रा महक तो ले, नज़र ज़रा बहक तो ले
ये शाम ढल तो ले ज़रा ये दिल सम्भल तो ले ज़रा
मैं थोड़ी देर जी तो लूँ, नशे के घूँट पी तो लूँ
नशे के घूँट पी तो लूँ
अभी तो कुछ कहाँअहीं, अभी तो कुछ सुना नहीं
अभी न जाओ छोड़कर के दिल अभी भरा नहीं

सितारे झिलमिला उठे, सितारे झिलमिला उठे, चराग़ जगमगा उठे
बस अब न मुझको टोकना
बस अब न मुझको टोकना, न बढ़के राह रोकना
अगर मैं रुक गई अभी तो जा न पाऊँगी कभी
यही कहोगे तुम सदा के दिल अभी नहीं भरा
जो खत्म हो किसी जगह ये ऐसा सिलसिला नहीं
अभी नहीं अभी नहीं
नहीं नहीं नहीं नहीं
अभी न जाओ छोड़कर के दिल अभी भरा नहीं

अधूरी आस, अधूरी आस छोड़के, अधूरी प्यास छोड़के
जो रोज़ यूँही जाओगी तो किस तरह निभाओगी
कि ज़िंदगी की राह में, जवाँ दिलों की चाह में
कई मुक़ाम आएंगे जो हम को आज़माएंगे
बुरा न मानो बात का ये प्यार है गिला नहीं
हाँ, यही कहोगे तुम सदा के दिल अभी नहीं भरा
हाँ, दिल अभी भरा नहीं
नहीं नहीं नहीं नहीं

आप आए तो ख़्याल-ए-दिल-ए-नाशाद आया

आप आए तो ख़याल-ए-दिल-ए नाशाद आया
कितने भूले हुए ज़ख़्मों का पता याद आया

आप के लब पे कभी अपना भी नाम आया था
शोख नज़रों से मुहब्बत का सलाम आया था
उम्र भर साथ निभाने का पयाम आया था
आपको देख के वह अहद-ए-वफ़ा याद आया

रुह में जल उठे बजती हुई यादों के दिए
कैसे दीवाने थे हम आपको पाने के लिए
यूँ तो कुछ कम नहीं जो आपने एहसान किए
पर जो माँगे से न पाया वो सिला याद आया

आज वह बात नहीं फिर भी कोई बात तो है
मेरे हिस्से में यह हल्की-सी मुलाक़ात तो है
ग़ैर का हो के भी यह हुस्न मेरे साथ तो है
हाय! किस वक़्त मुझे कब का गिला याद आया

इश्क़ की गर्मी-ए-जज़्बात किसे पेश करूँ

इश्क़ की गर्मी-ए-जज़्बात किसे पेश करूँ
ये सुलग़ते हुए दिन-रात किसे पेश करूँ

हुस्न और हुस्न का हर नाज़ है पर्दे में अभी
अपनी नज़रों की शिकायात किसे पेश करूँ

तेरी आवाज़ के जादू ने जगाया है जिन्हें
वो तस्सव्वुर, वो ख़यालात किसे पेश करूँ

ऐ मेरी जान-ए-ग़ज़ल, ऐ मेरी ईमान-ए-ग़ज़ल
अब सिवा तेरे ये नग़मात किसे पेश करूँ

कोई हमराज़ तो पाऊँ कोई हमदम तो मिले
दिल की धड़कन के इशारात किसे पेश करूँ

कभी कभी मेरे दिल में, ख़याल आता है-1

कभी कभी मेरे दिल में, ख़याल आता है
के जैसे तुझको बनाया गया है मेरे लिये
तू अबसे पहले सितारों में बस रही थी कहीं
तुझे ज़मीं पे बुलाया गया है मेरे लिये
कभी कभी मेरे दिल में, ख़याल आता है

कभी कभी मेरे दिल में, ख़याल आता है
के ये बदन ये निगाहें मेरी अमानत हैं
ये गेसुओं की घनी छाँव हैं मेरी ख़ातिर
ये होंठ और ये बाहें मेरी अमानत हैं
कभी कभी मेरे दिल में, ख़याल आता है

कभी कभी मेरे दिल में, ख़याल आता है
के जैसे तू मुझे चाहेगी उम्र भर यूँही
उठेगी मेरी तरफ़ प्यार की नज़र यूँही
मैं जानता हूँ के तू ग़ैर है मगर यूँही
कभी कभी मेरे दिल में, ख़याल आता है

कभी कभी मेरे दिल में, ख़याल आता है
के जैसे बजती हैं शहनाइयां सी राहों में
सुहाग रात है घूँघट उठा रहा हूँ मैं
सुहाग रात है घूँघट उठा रहा हूँ मैं
सिमट रही है तू शरमा के मेरी बाहों में
कभी कभी मेरे दिल में, ख़याल आता है

कभी ख़ुद पे कभी हालात पे रोना आया

कभी ख़ुद पे, कभी हालात पे रोना आया ।
बात निकली तो हर एक बात पे रोना आया ॥

हम तो समझे थे कि हम भूल गए हैं उन को ।
क्या हुआ आज, यह किस बात पे रोना आया?

किस लिए जीते हैं हम, किसके लिए जीते हैं?
बारहा ऐसे सवालात पे रोना आया ॥

कौन रोता है किसी और की ख़ातिर, ऐ दोस्त!
सब को अपनी ही किसी बात पे रोना आया ॥

किसी पत्थर की मूरत से मुहब्बत का इरादा है

किसी पत्थर की मूरत से मुहब्बत का इरादा है
परस्तिश की तमन्ना है, इबादत का इरादा है
किसी पत्थर की मूरत से …

जो दिल की धड़कनें समझे न आँखों की ज़ुबाँ समझे
नज़र की गुफ़्तगू समझे न जज़बों का बयाँ समझे
उसी के सामने उसकी शिक़ायत का इरादा है
किसी पत्थर की मूरत से …

मुहब्बत बेरुख़ी से और भड़केगी वो क्या जाने
तबीयत इस अदा पे और फड़केगी वो क्या जाने
वो क्या जाने कि अपना किस क़यामत का इरादा है
किसी पत्थर की मूरत से …

सुना है हर जवाँ पत्थर के दिल में आग होती है
मगर जब तक न छेड़ो, शर्म के पर्दे में सोती है
ये सोचा है की दिल की बात उसके रूबरू कह दे
नतीजा कुच भी निकले आज अपनी आरज़ू कह दे
हर इक बेजाँ तक़ल्लुफ़ से बग़ावत का इरादा है
किसी पत्थर की मूरत से …

चलो इक बार फिर से

चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों ।

न मैं तुम से कोई उम्मीद रखूँ दिलनवाज़ी की,
न तुम मेरी तरफ़ देखो ग़लत अन्दाज़ नज़रों से ।
न मेरे दिल की धड़कन लड़खड़ाए मेरी बातों से,
न ज़ाहिर हो तुम्हारी कशमकश का राज़ नज़रों से ॥

तुम्हें भी कोई उलझन रोकती है पेशक़दमी से,
मुझे भी लोग कहते हैं ये जलवे पराए हैं ।
मेरे हमराह भी रुसवाइयाँ हैं मेरे माज़ी की,
तुम्हारे साथ भी गुज़री हुई रातों के साए हैं ॥

तारुफ़ रोग हो जाए तो उसको भूलना बेहतर,
ताल्लुक बोझ बन जाए तो उसको तोड़ना अच्छा ।
वो अफ़साना जिसे अन्जाम तक लाना न हो मुमकिन,
उसे एक ख़ूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा ॥

जाएँ तो जाएँ कहाँ

जाएँ तो जाएँ कहाँ
समझेगा कौन यहाँ दर्द भरे दिल की जुबाँ
जाएँ तो जाएँ कहाँ

मायूसियों का मजमा है जी में
क्या रह गया है इस ज़िन्दगी में
रुह में ग़म दिल में धुआँ
जाएँ तो जाएँ कहाँ

उनका भी ग़म है अपना भी ग़म है
अब दिल के बचने की उम्मीद कम है
एक किश्ती सौ तूफ़ाँ
जाएँ तो जाएँ कहाँ

ज़िन्दगी भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात-1

ज़िन्दगी-भर नहीं भूलेगी वह बरसात की रात
एक अन्जान हसीना से मुलाक़ात की रात

हाय! वह रेशमी जुल्फ़ों से बरसता पानी
फूल-से गालों पे रुकने को तरसता पानी
दिल में तूफ़ान उठाए हुए जज़्बात की रात
ज़िन्दगी-भर नहीं भूलेगी वह बरसात की रात

डर के बिजली से अचानक वह लिपटना उसका
और फिर शर्म से बल खाके सिमटना उसका
कभी देखी न सुनी ऎसी तिलिस्मात की रात
ज़िन्दगी-भर नहीं भूलेगी बरसात की रात

सुर्ख़ आँचल को दबा कर जो निचोड़ा उसने
दिल पर जलता हुआ एक तीर-सा छोड़ा उसने
आग पानी में लगाते हुए हालात की रात
ज़िन्दगी-भर नहीं भूलेगी वह बरसात की रात

मेरे नग़मों में जो बसती है वो तस्वीर थी वो
नौजवानी के हसीं ख़्वाब की ताबीर थी वो
आसमानों से उतर आई थी जो रात की रात
ज़िन्दगी-भर नहीं भूलेगी वह बरसात की रात

तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले

तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले
अपने पे भरोसा है तो ये दाँव लगा ले

डरता है ज़माने की निगाहों से भला क्यों
इन्साफ़ तेरे साथ है इल्ज़ाम उठा ले

क्या ख़ाक वो जीना है जो अपने ही लिए हो
ख़ुद मिट के किसी और को मिटने से बचा ले

टूटे हुए पतवार हैं किश्ती के तो ग़म क्या
हारी हुई बाहों को ही पतवार बना ले

तुम अगर साथ देने का वादा करो

तुम अगर साथ देने का वादा करो
मैं यूँही मस्त नग़मे लुटाता रहूं
तुम मुझे देखकर मुस्कुराती रहो
मैन तुम्हें देखकर गीत गाता रहूँ,
तुम अगर…

कितने जलवे फ़िज़ाओं में बिखरे मगर
मैने अबतक किसीको पुकरा नहीं
तुमको देखा तो नज़रें ये कहने लगीं
हमको चेहरे से हटना गवारा नहीं
तुम अगर मेरी नज़रों के आगे रहो
मैन हर एक शह से नज़रें चुराता रहूँ,
तुम अगर…

मैने ख़्वाबों में बरसों तराशा जिसे
तुम वही संग-ए-मरमर की तस्वीर हो
तुम न समझो तुम्हारा मुक़द्दर हूँ मैं
मैं समझता हूं तुम मेरी तक़दीर हो
तुम अगर मुझको अपना समझने लगो
मैं बहारों की महफ़िल सजाता रहूँ,
तुम अगर…

मैं अकेला बहुत देर चलता रहा
अब सफ़र ज़िन्दगानी का कटता नहीं
जब तलक कोई रंगीं सहारा ना हो
वक़्त क़ाफ़िर जवानी का कटता नहीं
तुम अगर हमक़दम बनके चलती रहो
मैं ज़मीं पर सितारे बिछाता रहूँ,
तुम अगर साथ देने का वादा करो …

तुम्हारी नज़र क्यों खफ़ा हो गई

तुम्हारी नज़र क्यों खफ़ा हो गई
खता बख्श दो गर खता हो गई
हमारा इरादा तो कुछ भी न था
तुम्हारी खता खुद सज़ा हो गई
तुम्हारी …

सज़ा ही सही आज कुछ तो मिला है
सज़ा में भी इक प्यार का सिलसिला है
सज़ा ही सही आज कुछ तो मिला है
सज़ा में भी इक प्यार का सिलसिला है
मोहब्बत का कुछ भी अन्जाम हो
मुलाक़ात ही इल्तजा हो गई
तुम्हारी …

मुलाक़ात पे इतने मगरूर क्यों हो
हमारी खुशामद पे मजबूर क्यों हो
मुलाक़ात पे इतने मगरूर क्यों हो
हमारी खुशामद पे मजबूर क्यों हो
मनाने की आदत कहां पड़ गई
खताओं की तालीम क्या हो गई
तुम्हारी …

सताते न हम तो मनाते ही कैसे
तुम्हें अपने नज़दीक लाते ही कैसे
सताते न हम तो मनाते ही कैसे
तुम्हें अपने नज़दीक लाते ही कैसे
किसी दिन की चाहत अमानत ये थी
वो आज दिल की आवाज़ हो गई
तुम्हारी …

तेरा मुझसे है पहले का नाता कोई

तेरा मुझसे है पहले का नाता कोई
यूँ ही नहीं दिल लुभाता कोई
जाने तू या जाने ना, माने तू या माने ना

देखो अभी खोना नहीं, कभी जुदा होना नहीं
हरदम यूँ ही मिले रहेंगे दो नैन
वादा रहा ये इस शाम का
जाने तू या जाने ना, माने तू या माने ना

वादे गये बातें गईं, जागी जागी रातें गईं
चाह जिसे मिला नहीं, तो भी कोई गिला नहीं
अपना तो क्या जिये मरे चाहे कुछ हो
तुझको तो जीना रास आ गया
जाने तू या जाने ना, माने तू या माने ना

 

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