साहिबु जिस का नंगा भुखा होवै-श्लोक -गुरू राम दास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Ram Das Ji

साहिबु जिस का नंगा भुखा होवै-श्लोक -गुरू राम दास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Ram Das Ji

साहिबु जिस का नंगा भुखा होवै तिस दा नफरु किथहु रजि खाए ॥
जि साहिब कै घरि वथु होवै सु नफरै हथि आवै अणहोदी किथहु पाए ॥
जिस दी सेवा कीती फिरि लेखा मंगीऐ सा सेवा अउखी होई ॥
नानक सेवा करहु हरि गुर सफल दरसन की फिरि लेखा मंगै न कोई ॥2॥306॥

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