सावन के त्योहार में-दर्द दिया है-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

सावन के त्योहार में-दर्द दिया है-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

तूने मुझको ऐसे लूटा है इस भरे बज़ार में
चुनरी तक का रंग उड़ गया सावन के त्योहार में!

मैं तो आई थी खरीदने हीरक-बेंदी भाल की,
कच्ची चूड़ी किन्तु पिन्हादी तूने सोलह साल की,
दाम लिया कुछ नहीं छली ! पर छल मुझसे ऐसा किया
गाँठ टटोली तो देखा है पूँजी लुटी त्रिकाल की,
उन नयनों की चितवन जाने बिन बोले क्या कह गई
डूबी मेरी नींद सदा को मेरी ही दृग-धार में!

चुनरी तक का रंग उड़ गया सावन के त्योहार में!

अब तो निशि-दिन नयन खड़े रहते तेरे ही द्वार पर
उठ-उठ पाँव दौड़ जाते हैं किसी नदी के पार पर
हो इतनी बदनाम गई इस चोरी-चोरी प्रीति में,
गली-गली हंसती है मेरे काजल पर श्रृंगार पर,
बहुत चाहती लोग न जाने मेरे-तेरे नेह को
तेरा ही पर नाम अधर जपते हर-एक पुकार में !

चुनरी तक का रंग उड़ गया सावन के त्योहार मेँ!

आये लाखों लोग ब्याहने मेरी क्वांरी पीर को
पर कोई तसवीर न भाई धायल ह्रदय अधीर को,
बात चली जब-जब विवाह की सिसका आँसू आँख का,
रात-रात-भर रही कोसती नथनी श्वास-समीर को,
कैसे किसके गले डाल दूँ माला अपने हाथ से
मैं तो अपनी नहीं, धरोहर है तेरी संसार में ।

चुनरी तक का रंग उड़ गया सावन के त्योहार में!

सौ-सौ बार द्वार आई मधुऋतु ले हंसी पराग की
एक न दिन भी पर मुसकाई ऋतु मेरे अनुराग की,
लाखों बार घटा ने बदली बिजली वाली कंचुकी
दमकी मेरे माथ न अब तक टिकुली किन्तु सुहाग की,
कैसे काटूँ रात अकेली, कैसे झेलूँ दाह यह !
बारी प्रीति सयानी होने वाली है दिन चार में!

चुनरी तक का रंग उड़ गया सावन के त्योहार में!

पकी निबौरी, हरे हो गये पीले पत्ते आम के
लिये बादलों ने हाथों में हाथ झुलसती घाम के,
भरे सरोवर-कूप, लग गई नदियाँ-सागर के गले,
खिले बाग के फूल, मिले आ पथिक सुबह के शाम के,
कैसे तुमसे मिलूँ मगर मैं जनम-जनम के मीत ओ!
चुन रक्खा है मुझे साँस ने मिट्टी की दीवार में!

चुनरी तक का रंग उड़ गया सावन के त्योहार में!

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