सावन-काव्यगंधा -कुण्डलिया संग्रह -त्रिलोक सिंह ठकुरेला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Trilok Singh Thakurela Part 8

सावन-काव्यगंधा -कुण्डलिया संग्रह -त्रिलोक सिंह ठकुरेला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Trilok Singh Thakurela Part 8

 

सावन

सावन बरसा जोर से, प्रमुदित हुआ किसान।
लगा रोपने खेत में, आशाओं के धान।।
आशाओं के धान, मधुर स्वर कोयल बोले।
लिये प्रेम-संदेश, मेघ सावन के डोले।
‘ठकुरेला’ कविराय, लगा सबको मनभावन।
मन में भरे उमंग, झूमता गाता सावन।।

***

सावन का रुख देखकर, दादुर ने ली तान।
धरती दुल्हन सी सजी, पहन हरित परिधान।।
पहन हरित परिधान, मोर ने नृत्य दिखाया।
गूँजे सुमधुर गीत, खुशी का मौसम आया।
‘ठकुरेला’ कविराय, मास है यह अति पावन।
कितने व्रत, त्यौहार, साथ में लाया सावन।।

***

जल की बूँदों ने दिया, सुखदायक संगीत।
विरही चातक गा उठा, विरह भरे कुछ गीत।।
विरह भरे कुछ गीत, नायिका को सुधि आई।
चला गया परदेश, हाय, प्रियतम हरजाई।
‘ठकुरेला’ कविराय, आस है मन में कल की।
सिहर उठे जलजात, पड़ीं जब बूँदें जल की।।

***

छाई सावन की घटा, रिमझिम पड़े फुहार।
गाँव गाँव झूला पड़े, गूँजे मंगल चार।।
गूँजे मंगलचार, खुशी तन मन में छाई।
गरजें खुश हो मेघ, बही मादक पुरवाई।
‘ठकुरेला’ कविराय, खुशी की वर्षा आई।
हरित खेत, वन, बाग, हर तरफ सुषमा छाई।।

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