सारा बाग़ नज़र आता है-गीत-अगीत-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj 

सारा बाग़ नज़र आता है-गीत-अगीत-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

मैंने तो सोचा था तेरी छाया तक से दूर रहूँगा,
चला मगर तो जाना हर पथ तेरे ही घर को जाता है।

इतने बदले पंथ कि जीवन
ही बन गया एक चौरस्ता,
सूखा पर न कभी जो भेंटा
तूने सुधियों का गुलदस्ता,
जाने यह कौन-सा दर्द है, जाने यह कौन-सा कर्ज़ है,
जिसे चुकाने हर सौदागर कपड़े बदल-बदल आता है।

तुमसे छिपने की कोशिश में
ओढ़ गुनाह लिया हर कोई
याद न आती रात मगर जब
आँख न छिप-छिप कर हो रोई
कैसे तुझसे रिश्ता टूटे, कैसे तुझसे नाता छूटे
मरघट के रस्ते में भी तो तेरा पनघट मुस्काता है।

कोई सुमन न देखा जिसमें
बसी न तेरी गंध-श्वास हो,
कोई आँसू मिला न जिसको
तेरे अंचल की तलाश हो,
चाहे हो वह किसी रंक की, चाहे हो वह किसी राव की,
तू ही तो बनकर कहार हर डोली नैहर से लाता है।

जब तक तेरा दर्द नहीं था
श्वास अनाथ, उमर थी क्वाँरी
खुशियाँ तो हैं दूर, न दुख
तक से थी कोई रिश्तेदारी,
लेकिन तेरा प्यार हृदय को जगा गया, उस दिन से मुझ को
छोटी से छोटी पत्ती में सारा बाग़ नज़र आता है।

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