सापेक्षता-अनंतिम_कविता संग्रह-कुमार अंबुज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kumar Ambuj

सापेक्षता-अनंतिम_कविता संग्रह-कुमार अंबुज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kumar Ambuj

 

मैं तुम्हें प्यार करता हूँ
और कभी-कभार करता हूँ क्रोध
या कहूँ कि मुझे याद आता है मेरा बचपन
कि दुःखों ने घेर रखा है मुझे और देखो चक्रव्यूह में कुछ चमकता है
रात-दिन चलती हैं मशीनें और यकायक रचती हैं मौन
टूटता है चिड़िया का पंख और चक्कर खाता है हवा में
और ये हम हैं-
जो पशु हैं मगर मनुष्य होने के अर्थ और बोध से भरे हुए

यह सब सापेक्षता है

कोई भी शब्द, स्वर या क्रिया इससे परे नहीं
यही है वह शब्द जो बसा हुआ जड़-चेतन के केंद्रक में
इसको समझे बिना एक पल भी गुज़ारा नहीं
एक कदम भी नहीं बढ़ाया जा सकता जीवन में
विचारों से, अँधेरों से, सँकरे-चौड़े रास्तों से गुजरते
करते सही-गलत की पहचान बचते हुए दुर्घटनाओं से
चले आए हैं हम यहाँ तक इस के सहारे
और इतनी मज़ेदार यह कि जो नहीं जानते
कि आखिर यह सापेक्षता है क्या बला
वे भी सिर्फ इसीकी वजह से जीवित रहते आए अब तक
और जिन्हें कुछ-कुछ मालूम है वे मंद हँसी में सोचते हैं
कि हज़ार जीवन पाकर भी भला इसे किस तरह समझा जाए ठीक-ठीक !

तारामंडल, हँसी, रुदन,
पत्थर, मौसम, झूठ,
रहस्य और ज्ञान
सब कुछ के पीछे चुपचाप काम करती हुई
यही सापेक्षता भौतिकी और गणित के बाहर भी पसरी हुई चर-अचर जगत में
सारे जीवन को हर जगह बनाती हुई सापेक्ष
विचारों की एक इतनी लंबी श्रृंखला कि उससे लगाए जा सकें
इस ब्रह्मांड के सैकड़ों चक्कर।

 

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