सागर मुद्रा-7-सागर-मुद्रा अज्ञेय-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya,

सागर मुद्रा-7-सागर-मुद्रा अज्ञेय-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya,

वहाँ एक चट्टान है
सागर उमड़ कर उस से टकराता है
पछाड़ खाता है
लौट जाता है

फिर नया ज्वार भरता है
सागर फिर आता है।
नहीं कहीं अन्त है

न कोई समाधान है
न जीत है न हार है
केवल परस्पर के तनावों का
एक अविराम व्यापार है

और इस में
हमें एक भव्यता का बोध है
एक तृप्ति है, अहं की तुष्टि है, विस्तार है:
विराट् सौन्दर्य की पहचान है।

और यहाँ
यह तुम हो
यह मेरी वासना है
आवेग निर्व्यतिरेक

निरन्तराल…
खोज का एक अन्तहीन संग्राम:
यही क्या प्यार है?

मांटैरे (कैलिफ़ोर्निया), मई, 1969

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