सागर मुद्रा-5-सागर-मुद्रा अज्ञेय-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya,

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कुहरा उमड़ आया
हम उस में खो गये
सागर अनदेखा

गरजता रहा।
फिर हम उमड़े
सागर अनसुना
बरजता रहा,

कुहरा हम में खो गया।
सब कुछ हम में खो गया,
हम भी
हम में खो गये।

सागर कुहरा हम
कुहरा सागर
शं…

मांटैरे (कैलिफ़ोर्निया), मई, 1969

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