सागर मुद्रा-1-सागर-मुद्रा अज्ञेय-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya,

सागर मुद्रा-1-सागर-मुद्रा अज्ञेय-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya,

आकाश
बदलाया
धूमायित
भवें कसता हुआ

झुक आया।
सागर सिहरा
सिमटा
अपनी ही सत्ता के भार से
सत्त्वमान
प्रतिच्छायित

भीतर को खिच आया।
फिर सूरज निकला
रुपहली मेघ-जाली से छनती हुई
धूप-किरनें

लहरियों पर मचलती हुई बिछलती हुई
इठलायीं।
तब फिर
वह मानो सिमट गयी

अपने भीतर को: दीठ खोयी-सी
सत्ता निजता भूली, सोयी-सी
लून लदी भीजी बयार से
मेरी आँखें कसमसायीं,
मैं ने हाथ उठाया-कि मेरे अनजाने

उस के केशों के धूप-मँजे सोने का
गीला जाल
मेरे चारों ओर
सहसा कस आया।

मांटैरे (कैलिफ़ोर्निया), मई, 1969

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