-सागर-मुद्रा अज्ञेय-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya, part 4

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कातिक की रात

घनी रात के सपने
अपने से दुहराने को
मुझे अकेले
न जगा!
कृत्तिकाओं के
ओस-नमे चमकने को
तकने
मुझे अकेले
न जगा!
तकिये का दूर छोर
टोहने
इतनी भोर में
मुझे अकेले
न जगा!
सोया हूँ? मूर्छित हूँ!
पर अन्धे कोहरे में
बिछोहने
न जगा, न जगा, न जगा!

बर्कले (कैलिफ़ोर्निया), नवम्बर, 1969

गजर

गजर
बजता है
और स्वर की समकेन्द्र लहरियाँ
फैल जाती हैं
काल के अछोर क्षितिजों तक।
तुम:
जिस पर मेरी टकराहट:
इस वर्तमान की अनुभूति से
फैलाता हुआ हमारे भाग का वृत्त
अतीत और भविष्यत्
काल के अछोर क्षितिजों तक।

बर्कले (कैलिफ़ोर्निया), 31 अक्टूबर, 1969

काँपती है

पहाड़ नहीं काँपता,
न पेड़, न तराई;
काँपती है ढाल पर के घर से
नीचे झील पर झरी
दिये की लौ की
नन्ही परछाईं।

बर्कले (कैलिफ़ोर्निया), नवम्बर, 1969

 

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