सागर-मुद्रा अज्ञेय-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya, collections 2

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नदी का पुल – 1

ऐसा क्यों हो
कि मेरे नीचे सदा खाई हो
जिस में मैं जहाँ भी पैर टेकना चाहूँ
भँवर उठें, क्रुद्ध;
कि मैं किनारों को मिलाऊँ
पर जिन के आवागमन के लिए राह बनाऊँ
उन के द्वारा निरन्तर
दोनों ओर से रौंदा जाऊँ?
जब कि दोनों को अलगाने वाली
नदी
निरन्तर बहती जाए, अनवरुद्ध?

बर्कले (कैलिफ़ोर्निया), 29 अक्टूबर, 1969

नदी का पुल – 2

इस लिए
कि मैं कोई नहीं हूँ
मैं उपकरण हूँ
जिन के काम आया हूँ
उन्हीं का बनाया हूँ
नदी से ही उन का
सीधा नाता है।
वही उन की सच्चाई है
जो मेरे लिए खाई है।

बर्कले (कैलिफ़ोर्निया), 30 अक्टूबर, 1969

जीवन-मर्म

झरना: झरता पत्ता
हरी डाल से अट गया।

बर्कले (कैलिफ़ोर्निया), 27 अक्टूबर, 1969

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