सागर-तट : सांध्य तारा-अरी ओ करुणा प्रभामय अज्ञेय-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya,

सागर-तट : सांध्य तारा-अरी ओ करुणा प्रभामय अज्ञेय-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya,

मिटता-मिटता भी मिटा नहीं आलोक,
झलक-सी छोड़ गया सागर पर।
वाणी सूनी कह चुकी विदा: आँखों में
दुलराता आलिंगन आया मौत उतर।

एक दीर्घ निःश्वास:
व्योम में सन्ध्या-तारा
उठा सिहर।

हांगकांग शिखर, 19 जनवरी, 1958

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